PRIYANKA WAGHELA

For buying paintings please contact our studio via email, Facebook messanger or filling the contact form

 

1
चाँद के कुछ और करीब


चाँद के कुछ और करीब ...
नीले रंग के पास थोड़ा सा पीला रंग है ..
आँखों को कुछ देता हुआ सा !
इसी तरह रंग - रंगीन ही रहेंगे -
अगर तुम दिखाई दे जाओगे ..थोड़े से पीले रंग की तरह !!


2
मेरे अपने रंग


अपने आपको कभी लिखने के लिए मजबूर नहीं किया मैंने
इसलिये अक्सर इन शब्दों से निकल आती हूँ मै
जैसे धान के खेत में घुसकर
हरे रंग से निकल आई थी मै
सूरजमुखी को छूकर
पीले रंग से
और मंदिर के रास्ते
पलाश के रंग की निकल आई थी मै
पहली बार रंगों के इतने करीब थी
कि इसबार कागज़ को नहीं
खुद को रंग आई थी मै


3
खिलना


जीवन मे रंगों का खिल जाना
अकस्मात ही होता है,
एक फूल की तरह |
जिसे कली से फूल में बदलते हुए देखना
अच्छा लगता है –
एक आश्चर्य की तरह
उसे परत दर परत खुलते देखने की बजाय,
अच्छा है अकस्मात् खिले हुए देखना –
जीवन की तरह
जिसमे हम अकस्मात् ही खिलते हैं !
फूलो की तरह |


4
प्रेम के रंग के मध्य


नीला सुनहरा प्रेम
सुनहरा नीला आकाश
सुनहरा ऐसा कि जैसे
नीले में डुबकी लगाकर
निकला हो अभी अभी
नीला ऐसा कि जैसे
सुनहरा डुबकी लगाते
समय घुल गया हो
थोड़ा सा
इन दोनों के एक दूसरे में
रंग जाने के मध्य है
प्रेम
जैसे -
नीले सुनहरे आकाश में
चुपके से दिखाई गया हो चाँद
प्रेम के रंग के मध्य
रंगों को जोड़ते बिंदू की तरह


5
शब्द

 

कभी कभी शब्द
बहुत  पास आकर बैठ जाते हैं
पुराने मित्र या परिचित की तरह ,
जिन्हें हमारे साथ बैठने की आदत रही हो.
हर दिन के मिलने वालो की तरह 
शब्द रोज नहीं मिला करते
वे हमारे साथ तो होते हैं
लेकिन नाटक में पात्र को दिए हुए
संवाद की तरह .
जिन्हें महसूस किया है,
इसलिये नही बोला जाता
केवल बोलना है -  इसलिये बोला जाता है .
पर हम हमेशा, पात्र नही हो सकते
जब हम पात्रो से निकलकर
अपने आप में लौटते हैं,
तो हमें हमारे शब्द
पुराने मित्र कि तरह आत्मीय लगते  है.
जिनके साथ बिना कुछ बोले भी
बैठा जा सकता है .

6
एक चित्रकार

 

एक गहरी भूरी रेखा काली में बदलती हुई
काली भूरी रेखाओं के बीच झांकता वह,
बिखरे हुए अणुओं को समेट,
अस्तित्व के आकार को टटोलता
निःशब्द की रेखाओं के बीच अपने आकार को ढूंढ रहा है,
चारो ओर उसे छूकर गुजरते
समय के आकार प्रतिबिम्ब
उसके द्वारा रचे गए आकारों की तरह लग रहें हैं
क्या वह इनके बीच स्वयं को ढूंढ पायेगा ?
या फिर वह स्वयं इनमें से एक होकर
हमारे आसपास से बिना किसी पद चाप के गुजर जाएगा |


7
मन

 

मन अनमना सा है
पता नहीं
कहाँ से सुन आया है
रंगों के बारे में कि रंग –
सूरज के पास पोटली में बंधें है
हम ही है जो पास जाते नहीं है !
सुन आया है फूलों के बारे में
कि फूल ,पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर
बादल के पास मुरझाते नहीं है !!
सुन आया है सपनों के बारे में
कि – सपने रेगिस्तान की झील के पास ,
सच हो जाते है !
हमें भटकाते नहीं है
और लौट ही नहीं रहा वापस
इधर माँ रोटी सेंकने को और पापा –
चाय के लिये आवाज़ लगाते है  |


8
तुम

 

विषाद के गहन अन्धकार में तुम्हारी हँसी
जैसे चाँद काले बादलों से
आँख मिचौली हो खेल रहा
तुम ठहरने ही नहीं देते
मन के किसी कोने में
निराश कर देने वाला मन
उछलकर बाहर आ जाता है –
जीवन मुझसे !
जैसे तुम्हारी आहट पर दौड़ पड़ती हूँ
घर की दहलीज़ तक |
तुम्हारे आ जाने से –
मन के खिले कोने का पराग बरस जाता है
चारों ओर छाये वसंत की तरह
एक खुशबू होती है जिसे
महसूस करता है मन
और खिल उठता है सब कुछ
बस अभी ही थमी बारिश के बाद –
छाई हरियाली की तरह
तुम पे बरस पड़ती हूँ जब मैं
तुम बरस जाते हो
पहली बारिश की तरह
नहीं रहने देते
तप्त प्यासी बंजर ज़मीन का
सूखा एक भी कोना
जो सबसे अधिक जलता है
सबसे अधिक खिलता है
बहता है ,डूबता है ,उबरता है
और तुम पर आकर ही थमता है
गहन अंधकार को झकझोरते
दीप की तरह
तुम नहीं रहने देते
मुरझाये अतीत का बाकी कुछ भी –
सार्थक वर्तमान की तरह

 

9
घर बोलनें लगेगा

 

आज सुबह मै आँगन में टहल रही थी ,
अपने आसपास की चीजों को
एक एक करके देख रही थी
सब शांत से थे –
पेड़ आसमान और घर भी
मेरा घर चुप है एकदम चुप !
मेरे पिता की तरह
हाँ आँगन में फिर से नन्हें सफ़ेद फूलों वाली
घाँस उग आई है
फूलों के खिलने पर शायद
चिड़िया फिर से आयेगी !
और मेरा घर बोलने लगेगा


10
तेरी खुशबु वाला घर


मन कभी बारिश की बूंदों सा है तो कभी,
बहते आसुओं सा
कुछ देर को आकाश में उभरे इन्द्रधनुष सा या फिर ,
गहरे धंसे बारीक़ शूल सा
जीतेगा या हारेगा पता नही,
ढूंढ लेगा मगर तेरी खुशबू वाला घर

सीमाओं की रेखाए है ज़माने की बुनावट ,
तुझे महसूस करने के लिए
मेरा मन ही काफी है|

 

11
उदास हो !


चलो कुछ देर पैदल चलते है ...नंगे पाँव
मिट्टी का रंग पैरों के साथ हो लेगा !
तुम्हारा उदास होना चुभ जाता है ...
धरती का दरदरापन उतना नहीं चुभेगा |
तुमसे कहती हूँ मैं अक्सर किसी सड़क से गुज़रते हुए -
काश यहाँ एक ओर समंदर होता तो कितना अच्छा होता !!
तुम पकड़कर मेरा हाथ ..मुस्कुरा देते हो
जाने कितनी लहरों का शोर एक साथ सुनाई देता है !!
शाम हो रही है सूरज का बड़ा सा गोला-
दूर सड़क के आखिर में धरती से टिका हुआ है ....
देखो हम - तुम सिन्दूरी हुए जा रहे है !!
उदास हो .....अभी हँस पड़ोगे किसी मसखरे की तरह !!
धरी रह जायेगी मेरी सारी समझदारी ....
तुम्हारी फ़िक्र में परेशान चेहरे पर -
खिसियानी सी हंसी लिए मैं -
तुमसे भरपूर हाथापाई कर बैठूंगी !
हम देर तक छोटे बच्चों की तरह खिलखिलाएँगे |
जब मैं चुप रहूँ तो तुम पूछना .....
तुम दिखे तो मैं पूछूंगी -
पथरीला रास्ता, समंदर का किनारा ,आने वाला समय
जब कभी पूछेगा हमसे ...हम खिलखिलाकर हँस देंगे -
कि.............उदास हो ?


12
मै वो रंग हूँ जिसे कहा नहीं गया है


मैं धरती का वह बीज - जो सोना नहीं है मगर ,
किसी के आँगन में छाँव बन बरसों बरसता रहे ....
हरे पत्तों वाला पेड़ हूँ !
मैं उगा नहीं पाउँगा हीरा – पन्ना, मोती - माणिक पर -
मेरे फलों को कुतरती रहे छोटी चिड़िया या गुड़िया ,
मिठास दे सकूँ वह कल हूँ |
मेरे पास नहीं है कोई सैन्यबल....
दुनिया पर राज करे वह फ़ौलादी जिस्म मगर -
मैं सिखा सकता हूँ प्रेम !जो कभी युद्ध न होने देगा !!
मैं एक पगडण्डी उबड़ - खाबड़ धूलभरी ...
तुम चलते हुए सुस्ता लो थोड़ी देर ,
मेरे पास बैठो .....
गुनगुनाने को एक गीत दे सकूँ ...
वह अनगढ़ राह हूँ |
बेरंग बेआवाज़ सिसकियों से भरा जीवन ...
सबकुछ छिन जाने की पीड़ा से उठती -चीत्कार
बार- बार ठोकरों से घायल आत्मघाती मन ...
जीवन अब भी तुम्हारा है ! तुम्हारे लिए है !!
तुमने देखा नहीं मेरी ओर
मैं तुम्हारे भीतर- तुम्हारी आवाज़ !
कहो! इसबार करो अपनी कहानी पूरी !!
समय की सीढ़ियों पे लड़खड़ाओ अगर -
मुझे थामे रखना ...उम्र की सफेदी बेरंग करे अगर तो कहना मुझसे
तुम्हे इन्द्रधनुष दे जाऊँगा !!
मैं...
तुम्हारा वह रंग हूँ |
जिसके बारे में तुम्हे कभी कहा नहीं गया !!


13
सफेद रांगोली
पीले रंग पर बैठी ..वह केवल फूल के बारे में जानती थी
फूल का आकार- उसका आँगन था !
निःसंदेह वह एक चिड़िया थी
पता नहीं क्यूँ ! माँ उसे गुड़िया पुकारा करती !!
माँ फूल नहीं तोड़ा करती थी
वह आँगन लीपती ..और उसपर सफ़ेद रंग से -
रांगोली बनाती ... लक्छमी के पदचिन्हों वाली !
घर में लक्छमी नहीं थी |
वह सफ़ेद रंग के आस- पास, देर तक बनी रहती
और दूसरे रंग उसकी राह देखते ..
नन्ही चिड़िया थककर रंगों की गोद में सो जाती |
माँ उसदिन रंगीन चूड़ियाँ पहनती |
दीयों से सजा आँगन ..सोने सा दिपदिपाता !!
आँगन के बाहर का अँधेरा - गुड़िया नहीं जानती थी
उसका आकाश आँगन के आकार का था
माँ आँगन के बाहर देख सकती थी !
माँ देख रही थी ...रंग उसे ले जायेंगे
माँ ने अँधेरे के आकार पर -सफ़ेद रांगोली डाल दी !
चिड़िया तभी से अँधेरे का आकार नहीं जानती है ..
उसके आँगन का आकार - रंगों से सजा हुआ है
सफ़ेद रांगोली और लक्छमी के पदचिन्हों के साथ खड़ी माँ
उसे छूटे हुए घर के आकार सी लगती है
माँ अब घर के आँगन में -
नन्ही चिड़ियों के लिये दाने डालकर छिप जाती है
गुड़िया चिड़िया के आकार में रोज़ घर आती है |


14
पापा के लिये !!
आकाश की बात ..बहोत दूर है ,
उठ कर खड़े होने में काँपते हो पैर !!
तो कदम -दो -कदम भी करते मजबूर है ...
उछलता - कूदता सारा दिन दौड़ता बचपन !
जाने कहाँ खो गया ?
अक्सर ..पुराने दिनों को ख्यालों में दोहराते बुजुर्ग ,
ये कहते हुए दिखाई देते है |
बचपन वाली शैतानियों में लौटते हुए -
आपकी पीठ पर सवार हो जाते है !!
के घुमाओ पहले एक चक्कर - फिर उतरेंगे !
पुकारने पर ..तो छूटकर भाग जाया करते हो
माना हम सुनाते है पुराने किस्से वही ,बार- बार और तुम
ऊब जाया करते हो ...
पर तुम ही कहो ..अपनी नन्ही सी बिटिया की तस्वीर देख जो
हर बार ख़ुशी से भर उठते हो !
आज पहली बार हंसी ,है पहली बार चली ..
आज पहला दिन है विद्यालय का ..
हर दिन की प्रति क्यूँ संजोते हो ?
देखना ..कल हँसेगी तुमपर
जब इन तस्वीरों में ढूढ़ोगे उसका बचपन !
तुम्हारे साथ खड़ी , अपनें आसूँ छिपाती -
भाग जाएगी कुछ काम है कहकर और तुम अपनी लाठी टटोलते ..
उसे वापस बुलाओगे ,
पूरी तैय्यारी के साथ - पीठ पर लटक जाने को !
के पहले एक चक्कर घुमाओ बिटिया !!
तब ही पीछा छोड़ेंगे .....


15
आग्रह की चौखटें
दरवाज़ों पर लगी आग्रह की चौखटें ......
आत्मीयजनों को पुकार रही थी !
वो जो देखकर भी बाहर ही से लौट गए ...
और जो अनदेखा न कर सके कुछ देर को ठहर गए... उनमे गहरा अंतर महसूस किया, उन अपनों ने !
जिनके पास वें लौटकर गए |
चौखटें पुरानी थी ...दीमकों से लड़ती थकती ,
किसी तरह दरवाज़े को सम्हाले हुये थी ....फिर भी समेटे हुये थी आज भी नन्ही किलकारियाँ -
और माँ की लोरी जो सालोंसाल वो सुनाती रही
बनने तक दादी नानी-माँ !
पुराना कोई नहीं बचा है अब .....
ना ही बच पाता है कोई !
यह घर भी जाते जाते कुछ कह गया है ?
घर से विदा हुये  जो कुछ देर ठहर कर ...वे कहानी कहने लगे !! और उन्हें सुन रहे है वे सभी जिनका कोई घर न हो सका कभी .....|


16
खुशबुओं की दीवारों वाला
खुशबुओं की दीवारों वाले घर में रहना हुआ ! कभी अगर !!
कुछ पल ही हिस्से में आयेंगे , घर के- और हमारे ,
यह घर हमेशा के लिए नहीं हो सकता है !
खैर ! जितनी देर के लिए भी होगा ...
हमारे " जीवन का वह समय" हमेशा -
खुशबुओं की दीवारों से घिरा रहेगा |
कितना अच्छा है ना !!
न दीवारें गिरीं ...ना छत को तोड़ा गया
खुशबू थी घर था ...... अब चारों ओर -
बहती हुई हवा है, जैसे जीवन !!
और सर पर नीला आकाश !
कभी टूटता नहीं है ,
खुशबुओं की दीवारों वाला घर |


17
एक पात्र
यह एक कथा है और मेरे हिस्से का चरित्र मुझे जी रहा है
यहाँ हर कोई एक पात्र है ,
विडम्बना यह है !
की हम निरंतर ,अपने- अपने चरित्र की सीमाओं को -
लांघ जाने के अवसर की ताक में है |
जीवन की परिधि पर ,मृत्यु की वर्षा है
यह सबके हिस्से में आएगी |
यही नियति है !!


18
लक्ष्मण – रेखा
मेरी पीठ पर घना अँधकार था
और चेहरा सूरज की ओर
मै अँधकार के बारे मे बहुँत ज़्यादा नही सोच रही थी
और वह निष्फिक्र था यह सोचकर की -
मै कोई प्रतिवाद नही कर रही
रौशनी की किरणें मेरे अस्तित्व में उतर चुकीं थीं
और अँधकार अब भी अँधेरे में था
मै दहलीज़ पर थी और अब -
दोनों को एक साथ महसूस कर रही थी
मैंने तय किया कि,एक छोटे बच्चे की तरह
दहलीज़ को केवल एक रेखा मानते हुए -
उसपार जाकर देखूँ !
और मै रौशनी का हिस्सा हो गई
अँधेरा चुपचाप उसपार खड़ा देखता रहा
वह दहलीज़ अंधकार की लक्ष्मण रेखा थी -मेरी नही |


19
तेरी खुशबू वाला घर
मन कभी बारिश की बूंदों सा है तो कभी,
बहते आसुओं सा
कुछ देर को आकाश में उभरे इन्द्रधनुष सा या फिर ,
गहरे धंसे बारीक़ शूल सा
जीतेगा या हारेगा पता नही,
ढूंढ लेगा मगर तेरी खुशबू वाला घर
सीमाओं की रेखाए है ज़माने की बुनावट ,
तुझे महसूस करने के लिए
मेरा मन ही काफी है|


20
नदी
उसने सोचा वह नदी हो जाये
कल -कल कर बहती ,
मोड़ों पर ठिठके बिना राह बनाती जाये
कुछ पदचिन्हों से हताहत, किनारे खामोश रहे |
वे लौटे हैं , पितरों को एक नया पिण्ड दे
सोचते है कि मुक्त हुए अपने हिस्से का तर्पण दे किन्तु ,
नदी की कोख में है अब, मृत पिण्डों का डेरा
पोषित हो रहे निरंतर - आदम के कुंम्भ स्नान से
जन्म जन्मांतर के उतारे हुए पाप और कर्मकाण्ड से |
गर्भकाल पूरा होगा - जन्म लेगा वह
जिससे पीछा छुड़ा आये थे
अंशज होगा तुम्हारा ही
क्रमवार लौटेगा तुम तक |
जो मुक्त करती आ रही थी अभिषाप से
जननी होगी एक अभिषप्त मानव की
गंगा अब एक नाम है, नदी नही
कहते है स्वर्ग को लौट गई
जो दिखाई देती है वह – वह स्त्री है,
जो कभी नदी हो जाना चाहती थी |
नदी अपने उदगम की ओर नही लौटती है कभी
अपनी यात्रा पूर्ण कर सागर हो जाती है |


21
 पीली धूप
प्रेम के आँगन में पीली धूप
और काली बदली मानो एक साथ है
धूप एकदम कटख है , एकदम पीली,
वसंत के रंग सी,
कहीं कहीं पड़ रही है
काली बदली की छाँव, ऐसा लग रहा है मानो,
सांवली प्रियतमा अपने पीताम्बरधारी के साथ लुकाछुपी हो, खेल  रही
ह्रदय को गहराई तक तृप्त करतीचल रही है शीतल बयार,
समय हुए अपने भीतर प्रेम की भीनी महक ,
काली बदली खेल खेल में,
छू जाती धरती को
बरसते प्रेम की बूँदों से
मिट्टी का सौंधापन महक उठा है
अभी अभी प्रेम की धरती पर बने 
प्रियतमा के पदचिन्हों पर -
एक प्रेमी दौड़ गया है |


22
पुनरावृत्ति

जीवन में
घटनाओं , तिथियों और स्मरणों
की पुनरावृत्ति
हमें हमारे उदगम की ओर ले चलती है
जहाँ हम स्वयं की यात्रा पर होते है
और वहाँ से लौटकर
अपने जीवन में कुछ सार्थक नया जोड़ पाते हैं
स्वयं की यह पुनरावृत्ति
सहायक होती है
गतिमान समय पर
अपनी छाप छोड़ने वाले सृजन को गढ़
सृजनात्मक यात्री होने में


23
दृश्य से पहले

मैं अपने घर की पहली सीढ़ी पर मिला था उससे
मन में कौंध गए विचार की तरह
सीढ़ी दर सीढ़ी दृश्य बदलते गए
उसके हर दृश्य में मेरे विचार किसी घुसपैठिये की तरह
अपनी जगह ढूंढ रहें थे
मैंने भीतर स्वयं को टटोला
उसका आकार बढ़ रहा था
अनचाहे ही भ्रमित कर देने वाले स्थानों पर,
वह पगडंडीया बनाता
दौड़ता दिखलाई पड़ता है
क्षितिज के पार देखे जा सकने वाले
दृश्यों से बाहर
एक चौखट ढूँढ ली है उसने
मुझे लगता है वह धीरे - धीरे
लुप्त हो जाएगा, शायद
दृश्य से भी पहले |


24
क्या नया कहूँ !
मैं नऐ शब्दों को ढूंढ रही हूँ
जिनसे कहा जा सके शरद ऋतु की ओस को !
यूँ ही भटक कर बरामदे में आ गई धूप को
हरी घास पर लेटे हुए मन को ...
कबूतर घर के आँगन में -आँगन के कबूतर की तरह टहल रहा था !
पहली बार किसी पक्षी को इतने करीब से देखा - जब वह स्वतंत्र था !!
हल्का भूरा, मखमली राख़ और नीले में घुले हुए अबूझे रंग का जादू सम्मोहक था
मैं बस खड़ी रह गई ...वह स्वतंत्र था कभी भी उड़ सकता था |
कल - सुबह के लिए दरवाज़ा खोल रही थी ....
हवा के झोंके के साथ नये मौसम ने प्रवेश किया
एक सिहरन सी त्वचा पर उग आयी !
मैं दुशाले के लिए लौटती तो वह घर के भीतर होता -
मेरा घर अभी सो रहा था ...
घर के जागने तक उसे बरामदे में ही रुकना होगा
घर की सुबह नन्हे के जागने से होती है |
काली चिड़िया काफ़ी तीखी तेज़ तर्रार है !!
छोटी सी है बहुत ही छोटी -
इतनी ज़ोर से पुकारती है....कि
दूसरी चिड़ियों के साथ बाज़ भी चला आता है !
वह छोटी चिड़िया की केवल आवाज़ ही पहचानता है
"घर " के बगीचे की सबसे छोटी पत्ती के पीछे छिपी वह -
बाज़ के हाथ कभी नहीं आएगी !
बाज़ बुलंद आवाज़ वाली चिड़िया को ढूंढ रहा है ..
और निराश है !!
क्या नया लिक्खूं ? हर नया शब्द घर की बात कहता है
हर नयी ऋतु घर की कोई पुरानी बात याद करा जाती है
एक घर से दूसरे घर की यात्रा के बीच- अनवरत यात्रा में है - ओस, घनी धूप,और हरी घास पर लेटा हुआ मन ....!
घर से निकलती हूँ -घर साथ लेकर
और हड़बड़ी में लौट आती हूँ .....के बच्चे घर लौट आये होंगे |


25
भाषाओं के अर्थो में रंग
रंग, रंगों में वह दिखाई देता है
रंग उसकी भाषा है
हर रंग की अपनी एक अलग भाषा है
भाषाओं के अर्थो में रंग,
छुपकर ताकते हुए से लगते हैं .
देखो इन रंगों की ओर,
लाल -
चटख आक्रामक
जीवन से भरा ,
उसे छूकर उसमे घुलता हुआ पीला
प्रेमातुर वसंत की भाषा लिये हुए
दोनों के मध्य सिंदूरी हुआ वह कोना
खिला हुआ है दहकते हुए अस्तित्व की तरह ,
अस्तित्व हमारे भीतर कुछ खिल जाने की प्रतीक्षा करता है |


26
अनगढ़ कविता
मेरे पास नीले रंग के पंख होते अगर !
तो मैं पंछी नहीं आकाश हो जाती
मेरा उड़ना आकाश सुन लेता अगर ...
तो यह सोचकर की, यह तो उसके करवट की है आहट
मुझे ढूंढॅ लेने से, चूक गया होता |
मैं आकाश होना नहीं जानती हूँ
पंखों और उड़ने के बारे में भी केवल सोचा ही है मैनें !
कभी कभी तो जमीन पर ही ...
सोची हुई दूरियां भी तय नहीं कर पाती हूँ ...
क्या इस सबसे वाकई कोई फर्क पड़ता है ?
एक अनगढ़ कविता, अपने भाव कह दे अगर !
तो उसे दोबारा कसे जाने की, क्या सचमुच है जरूरत ?
मेरा लिखा पढ़ा गया अगर ..
और याद रह जाए तुम्हे !
तो- नीली स्याही से उड़ना लिखूंगी !!
और आकाश हो जाउंगी ...


27
दरवाज़ा
कभी  - कभी लगता है...
इस दरवाज़े के बाहर कुछ नहीं है
दरवाज़ा जो पर्दे से ढँका है,
उसके पीछे दरवाज़े को बंद करने वाला दरवाज़ा भी नहीं है !
मै भी कभी - कभी  खुद के लिये
अपने आपसे बाहर आने का दरवाज़ा बंद कर लेती हूँ
जब मुझे लगता है कि तुम मेरे भीतर हो !
जब कभी तुम बाहर जाते हो –
मै   दरवाजे के इस ओर होकर भी,  अपने आपमें नहीं होती हूँ
खुद को कमरे के अन्दर देखती हूँ पर ,
दरवाज़े के बाहर पाती हूँ !!
तुम जहाँ जहाँ जाते हो घर से बाहर
मैं वहाँ - वहाँ तुम्हारे साथ जाती हूँ
पर दरवाज़े के बाहर ख़ड़ी रहती हूँ
क्योंकि उन दरवाजों पर तुम्हारी उपस्थिति दिखाई पड़ती है –
मेरी नहीं ...
और मै दरवाज़े के बाहर अपने आपसे बाहर
तुम्हारा घर के दरवाज़े पर
और खुद का –
अपने में लौट आने का रास्ता देखती हूँ !! |


28
काला बादल
बादलों के साथ उड़ते हुए दृष्य
हमारी उम्र की आँखों के हिसाब से -
बदला करते है शायद !!
कल तक उनमे मै जो देखा करती थी
अब वे आकार, परीकथाओं का हिस्सा लगते है !
जो बचपन की तरह विदा हो चुके |
मुझे शब्दों की कमी खल रही है
वें भावों के पीछे दौड़ते हुए -गुम हो गए हैं
मै उनके बिना लड़खड़ा जाती हूँ
मिट्टी में पड़ रही बारिश की पहली बूँद की तरह
बस अभी- अभी तो थी !! और अब कहीं नहीं की तरह
कहीं  खो जाती हूँ |
क्या मै तुमसे कुछ कह रही हूँ ?
नहीं, मैं अक्सर खुद से यूँ ही बतियाती हूँ
फिर भी सोचती हूँ कि,तुम सुन लोगे शायद !
और फिर तुम्हारे चेहरे पर अपनी आँखों को बिठाकर
किसी और दिशा में देखने लगती हूँ
तुम उठकर चले जाते हो और दिशाएँ मुझसे कुछ नहीं कहती !!
मै दिशाओं से रूठकर, तुम्हारे साथ जाने से छूटे रह गए -
पदचिन्हों के पीछे ,उसी तरह चला करती हूँ जैसे -
बारिश के काले बादल के पीछे भागा करती थी कभी !
दो चोटियाँ बाँधे, छोटे छोटे फूलों की छपाई वाला फ्राक पहने
एक बचपन बादलों के दृष्य के पीछे भाग रहा है , और मै तुम्हारे पीछे !

मै अब तुम्हारे साथ चल रही हूँ , तुम कभी परीकथाओं का हिस्सा थे !!
बारिश का काला बादल -
अभी- अभी तो यहीं था और अब कहीं नहीं की तरह - दिखाई नहीं दे रहा !
हमारे आकार की भीगी धरती पर -बचपन खेल रहा है |


29
बादलों पर गाँव हो सकते है ?
बस ऐसे ही किसी दिन .... टहलते हुए
क्या पता पैर चुपचाप से उड़ने लगें !
अचानक बादलों पर पहुँचकर -
पीछे छूटी हुई धरती के पुकारने पर ,
एक दिन दिखाई दे !!
वह दिन, जिसमे बारीक चीटियों से हम
जाने किस बात पे परेशान ....
बस दौड़ते- भागते दिखाई दे |
और यहाँ !! यहाँ केवल बादल है और हम !
यहाँ कोई लकीर नहीं ,कोई माल्कियत नहीं
तुम हो !! बस यही महसूस कर सकते हो ....
बस यही, यही तो था वह क्षण !
जिसके लिये वर्षो से कवायदें की जा रही है धरती पर ..
पहले धरती भी अनगढ़ थी ...
उसका विराट आदिम सौंदर्य अप्रतिम था !!
फिर हमनें उसकी गोद से उठकर ..
उसका बँटवारा कर दिया
और अब हमारी नजरें आकाश की ओर है |
देखो बादल कहीं ठहरते ही नहीं !!
और हम कितनी छोटी- छोटी बातों पर ,
अटक जाया करते है ...
रहो धरती पर बादलों की ओर देखते हुए
बादल उड़ना सिखाते है - धरती घर देती है !!
उसकी मिट्टी में हमारा बचपन खिलता है ..
बादलों पे हम हमेशा नहीं हो सकते है
हम जहाँ है वहाँ घर है ..
घरों से गाँव है ,शहर है ,बसाहट है
मेरा तेरा करने वाले लोगों के बीच- अपना कहने वाले अपने भी है !
धरती ठहरी हुयी है हमारे लिये ...
तभी धरती पर हमारे पाँव है -खेत खलिहान गाँव है !!
बादल ठहरते नहीं केवल उड़ना जानते है !
बादलों पर गाँव ,कैसे हो सकते है !!


30
तुम्हारा नाम
हरी पत्तियों पर ....दिन हरा रहता है !!
चारों ओर हो कोई मौसम ,
मन हरा हो तो ...दिन खिला रहता है |
हर दिन उनसे बतियाते हुए ..गुज़रते है पहर
कई साल बीत जाने पर ,
गुज़रे हुए दिनों का पता चलता है |
बीत रहे है मासूम खुशगवार और नटखट दिन
सुख की कई गठरियाँ समेट रही हूँ !
मै अक्सर भूल जाया करती हूँ....इसलिए,
गठरियों पर लिख रक्खे है नाम -
एक गड़बड़ हो गयी है !!
बीते हुए सुख को खंगालने गयी ..
गठरियों के बीच मै गुम हो गयी !
दिन तो सारे याद है -
गठरियाँ हैरान कर गयीं
हर गठरी पर लिखा.... तुम्हारा नाम है !!


31
घर की ओर लौटते हुए
मैं कहीं भी क्यूँ जाना चाहती हूँ !
दो पैरों के ये जोड़े ....कितनी दूरियाँ नाप सकेंगे ?
मुझे पता है मैं थक जाउंगी ,.....कमज़ोर हो रही हूँ ..
नई जगह नए चेहरे... ऐसा लगता है जैसे नयी किताबें हो बिखरी !!
कितना कम पढ़ा है अभी ...!
जीवन नन्हे - नन्हे क्षणों में जाने कब, पूरा ही बीत जाएगा ..
आजकल किताबों को छूने का भी समय नहीं होता है |
काश मेरे पास भी होती - " दीवार में इक खिड़की "
मै अपनी दिनचर्या के बीच, चाहे जब कूद जाती ..
नित नए संसार में !!
और समेट लाती - बारिश, पगडंडियां, झरने -तलैय्याँ ,
गीली मिट्टी में लोटते बच्चे ,नीले पहाड़, सफ़ेद फूलों से ढकी वादियाँ ...
समंदर का किनारा, महल - गलियारे
रंग बिरंगे घर और उनमे बसते तरह तरह के लोग !!
मै हर बार वापस आकर थोड़ी नयी सी हो जाती !!
जाने कितना कुछ जुड़ता !! ..
खुल जाता... जाने अंजाने बंधा हुआ मन
गुनगुनाता हर बार नई जगह से लौटते हुए
वे सभी मेरे साथ ही होते - स्मृतियों की पोटली में बंधे दृश्य
मेरा कमरा खिड़की से कूदकर आये दृश्यों से भरा होता ठसाठस !!
मेरी पीठपर होती हरबार एक नई गठरी -
घर की ओर लौटते हुए ...
32
सुलगता हुआ दिन
सुलगता हुआ दिन राख होने को था
आकाश में ढल रही शाम ...
सुलगते हुए दिन का प्रतिबिम्ब थी ,
लाल सिन्दूरी आकाश खामोश नाराज़गी से कुछ कह रहा था !
अचानक चाँद की पतली लकीर बादलों के बीच -
इस तरह चमकने लगी !!
के आकाश की भाषा ही बदल गयी
अब आकाश रूमानी था ..और दिन -
दिन अब डूब रहा था शाम की गहरी आँखों में |
आकाश जादुई है !! जीवन की तरह
हर क्षण कुछ बदल रहा है ..कुछ बदल सकता है !!
जीवन के सुलगते समय पे "चाँद की लकीर खींच दो "
हर शाम एक नई कविता कह जाएगी !!


33
प्रेम ...कविता की तरह !
एक कविता की तरह मैं तुम्हारे पास थी !
तुमने भी मेरे होने को नहीं ...
उस एहसास को प्रेम किया !
जो किसी सहज अंकुरण की तरह
तुम्हारे ह्रदय में पहली बार आँखे खोल रही थी
एक कविता की तरह !!
कविता की तरह तुम्हारे ह्रदय में होना
हमेशा प्रेम में होने की तरह है !
प्रेम की धरती पर हरे रंग का अंकुरण है !!
जो तुम्हे देखता है बाहर से ..देखो !!
उसे पग रखने को भी जगह नहीं !
और तुम्हारे भीतर मैं,
हरे रंग की धरती पर ..वर्षों से
पहली लिखी कविता की तरह
तुम्हारे विस्तार से चकित !!
जाने कितने छितिज पार कर चुकी हूँ
देखो तुम अब भी हँसकर देख रहे हो मुझे !
पहली बार लिखी कविता की तरह !!
34
जब तुम नहीं होते हो
जाड़े की सुबह और धूप.....
शाम होने तक ठहरने का कह के ,
हड़बड़ाकर लौटती दोपहर !
और तो और समय से पहले धमक गयी शाम !!
सभी आस पास ही थे ....
शायद मै ही कही और थी !
“तुम” लौटोगे तो लौट आयेंगे सभी-
जो होकर भी नहीं होते है मेरे लिए
जब तुम नहीं होते हो ....
आस- पास कभी ..............|
35
बादल द्वार
यात्रा, केवल यात्रा ही तो है !
हम तय कर रहे है पड़ाव-
सबकी अपनी - अपनी गति है
अपनी अलग राहें ………
ढूँढकर एक घर की तरह का घर
रिश्तों की छांह और रसोई में पक रही ममता –
समेट लेंगे अपने आप को उन सारी यात्राओं से
जो हमें अनादि काल से पृथ्वी की परिक्रमा में ,
व्यस्त किये हुए है !!
उन आकृतियों के बीच –
जिनसे हमारी गर्भनाल जुड़ीं हुई हैं
हम असीम सम्भावनाओं की तरह
सीमित दायरों में भी –
जीवन के प्रारम्भ से अंत तक
उम्र के भिन्न –भिन्न, आकारों में
उन शब्दों की तरह होंगे –
जिनके साथ मधुर संगीत दिखाई न देकर भी
शरीर में आत्मा की तरह उपस्थित होता हुआ
हमें सार्थक कर जाएगा |
हम बादल द्वार की चौखट पर है –
यात्रा, अब शुरू होती है !!!
36
उधेड़बुन
शब्दों के उधेड़बुन से आकार लेती पंक्तियाँ
देखी,पढ़ी और सुनी जाती हैं |
वे शब्द जो बचे रह जाते हैं - विचारों के भीतर ,
कई दिनों तक फुसफुसाते - बुदबुदाते से सुनाई दिया करते हैं स्वयं के भीतर |
उनकी फुसफुसाहट की तरफ ध्यान देने लगो अगर !
तो खुद का भीड़ में होकर भी - कही और खो जाने का शक होने लगता है ,खुद को ही !
पर फिर अगले ही पल में एहसास होता है - कि
अच्छा है , बाहर घने शोर और तेज़ी से बदलते चकाचौंध द्रश्यों के बीच -
होकर भी नहीं होते हुए ,उस बचे हुए को सुन पाना
जो अनगढ़ सा छूट गया था भीतर |
और जिसके छूटने से " मैं " बची रह गई -
जैसी मैं हूँ , अपने भीतर .........|
37
बिटिया
शाम की शुरुवात पर दूर तक दिखाई देते खेतों के पीछे ........
सूरज का देखा जा सकने वाला चेहरा ...
कच्ची सी पगडंडी पर सुस्ताती सुनहरी धूप.......
बहुत दिन हुए उस यात्रा पर निकले हुए, जो घर की ओर ले जाती है
जिसकी शुरुवात में ही मुझे - आँगन में दौड़ती गुड़िया नज़र आती है |
पर अब जो घर है , वहाँ एक खाली कोना है ........
जहाँ से 'बिटिया' पुकारने की आवाज़ अब नहीं आती है
बिटिया अपनें घर से अब खाली हाथ लौटती है ,
उस आवाज़ से जो भी मिला करता था उसे -
स्मृतियों के पुरानें बक्से में टटोलती है |
सूरज ढल चुका है, वर्त्तमान की दस्तक से उसे
स्मृतियों के काल का पता चलता है
स्मृतियाँ अतीत ही होती है ,लेकिन
पिता के अतीत हो जाने पर -
स्वयं के अस्तित्व की रिक्तता और भी सघन हो जाती है -
जब भी आस पास कही से,
'बिटिया' पुकारे जाने की आवाज़ आती है |
38
खुशबू जैसा एक रंग
खुशबू जैसा एक रंग था,
देखना चाहो तो दृष्य से बाहर हो जाता
छूना चाहो तो पराई देह हो जाता
जानना चाहो तो पहेली हो जाता
ढूँढने जाओ तो कस्तूरी हो जाता
थककर बैठ गयी तो उतर आया आखों में
अब जहाँ भी देखती हूँ -रंग ही रंग है |
39
स्वप्न से यथार्थ तक
पैरों के नीचे हरी घांस का मैदान
ऊपर दूर तक फैला नीला आकाश
मैं अपने पैरों पर खड़ी नही होना चाहती
मै तय करना चाहती हूँ दूरी -
धरती से आकाश तक की
मै जन्मी ,बढ़ी और जननी हुई -
स्वयं के भीतर उपजे प्रश्नों के लिये भी उत्तरदायी हूँ
हारने का भय नही , जीतने की हड़बड़ाहट नही -
खुद को समेटकर ,धरती और आकाश के मध्य
इन्द्रधनुष सी दिखाई दे-
मै तय करना चाहती हूँ दूरी
स्वप्न से यथार्थ तक की |
40
बीत जाने के बाद भी
वक्त हमारे आसपास से गुज़रता है
और हम बीतते जाते हैं |
वह अनुभवशाली रहेगा हमेशा ही
हम अपने जीवन की लम्बाई जितना ही -
जान पाते है उसे ,और वह बस है
शायद हमेशा से ही ?
कुछ किस्से सुना करते है अतीत के ,
दुस्साहस कि - सपनें भी पल रहें है भविष्य के
उद्गगम और अंत रहित वह जानता है -
कहानियाँ अनगिनत |
उससे हार - जीत नही ना ही शिकायत है कोई
एक नन्ही सी उड़ान है उस आकाश के लिये
जिसका अस्तित्व है अशेष
इस प्रयास में जिया गया जीवन और प्राप्त होने वाली मृत्यु
समय पर हमारे पदचिन्ह होंगे |
हमारे बीत जाने के बाद भी |

41
उसका कहना
क्या पत्थरों के रंग जीवन बदल सकते है ?
रेतीले किनारों से दौड़ता हुआ वह जेबों में मुट्ठी भर रेत ले आया
पूछने पर कहा - समन्दर का किनारा साथ ले आया हूँ
देखना सागर मेरे पीछे आएगा ,
मै वही देखना चाहती हूँ जो उसने कहा है मुझसे -
सितारों की चाल ,ग्रहों की दशाएँ -समझना कठिन है मेरे लिये
उसका कहना के मै हूँ यहाँ -
रंगो से भरा जीवन हो जाता है -मेरे लिये
42
रंग, खुशबू और सपने
जीवन में बहुत थोड़े समय के लिये होते है,
रंग, खुशबू और सपने
जीवन के एक हिस्से के समय में,
यही हमारा जीवन होते है –
रंग , खुशबू और सपने |
जीवन के इस थोड़े से समय को –
पूरा जीवन कर लेना,
या – इस थोड़े से समय में –
पूरा जीवन जी लेना |
देखना ये हमारे नन्हों में बदल जायेंगे
जिनके साथ खिल जायेंगे रंग,
सितारों सी टिमटिमाएगी खुशबू और –
सपने सच होकर –
जीवन हो जायेंगे |
43
माँ कहती है
माँ कहती है सब अच्छा होगा
उसकी आँखों में देखती हूँ तो लगता है
हाँ सब अच्छा ही होगा
जब थककर सोती है वो –
तो नहीं बहती उसकी बंद आँखों से पानी की बूँद
जब बंद पलकों से मुस्कुराती है वह
तो लगता है –
सब अच्छा ही तो है
अब और क्या अच्छा होगा !!
44
माँ की गुड़िया
घर के आँगन  में एक नन्ही  सी बच्ची  
धूप में बैठी अपनी माँ के खुले बालों से खेलती
जब माँ ने चाहा उसे गोद में भरना
वह तेज़ी से दूसरी ओर भागी
नन्हें पाँव लडखड़ाऐ
आँगन की गीली मिट्टी में छपे
हाथ पैर और वो छोटा सा चेहरा भी
माँ ने नन्ही के उस सलोने रूप को देखा – मुस्कुराई
अपने दोनों हाथों को बढ़ाकर
उसे भर लिया गोद में
अब दोनों ही माँ के चेहरे पर है
गुडिया के होठ और गालों पर छपी मिट्टी भी !

45
ज़रुरत

एक गिरता हुआ घर
जिसकी जगह एक पक्के मकान की –
बहुँत ज्यादा ज़रुरत
घर का आँगन जिसमे –
पर्याप्त धूप बारिश और ताज़ी हवा के बाद भी
पक्की दीवारों की ज़रुरत |
माँ के बाज़ू में लेटी हुई, एक बेफ़िक्र नींद में
दीवारों के ढहने की आवाज़ !
पिता हमारे जीवन में
एक कमज़ोर दीवार की तरह
माता पिता को –
माता पिता की तरह के पक्के सहारे की
बहुँत ज्यादा ज़रुरत |

नया पक्का सुरक्षित मकान !
नये पक्के सुरक्षित मकान में –
एकाकी माता पिता,
उन्हें नये मकान में पुराने परिवार की
एक बार फिर ज़रुरत |
घर की समस्याओं के बीच चहचहाती सुबह की
दरकती दीवारों पर आकार सजाती,
मिट्टी के आँगन में पैरों के छाप बनाती
कमज़ोर घर के मज़बूत दरवाज़े पर
आवाज़ लगाती गुड़िया की ज़रुरत
उन बूढ़ी आँखों को गुड़िया के बचपन की
बहुँत ज्यादा ज़रुरत |


46
धूप का रंग
धूप का रंग अब भी सुनहरा है
हरे पत्तों पर ओस की बूंदे सुस्ता रही है
मन छोटे बच्चे की तरह छूटकर भागा है
दूर तक फैला हरे घांस का मैदान प्रतीक्षारत है
क्या कुछ है ? जो घटने को है ?
उम्र के कुछ पड़ाव बचपन से दूर ले आये है हमें
वह हमारी स्मृति मे है आँगन में खेलता है
और हम किसी बड़ी समस्या पर विचार विमर्ष कर रहे है
चलिए लौटें मिट्टी के आँगन में
आम बरगद ,पीपल और नीलगिरी के नीचे-
गपियाते हुये मीठे गन्ने की गंडेरी चबाए
धीमे -धीमे मुस्कुराना बहुत हुआ
पेट मै बल पड़ जाने तक हँसते जाए
क्यापता कल दुनियाँ जीत लेने के बाद
पलटकर देखें जब हम -
तो हाथों से छूटा हुआ यह अलमस्त एहसास
कामयाबी की किताब मै एक रिक्त स्थान छोड़ जाए |
47
मौन की भाषा

ग्रीष्म की प्रचण्ड दुपहरी
पसरा है चारों ओर, सूखे वृक्षों का मौन
केवल गुलमोहर बोल रहा है सुर्ख दहकते फूलों से
क्या शब्दों से सबकुछ कहा जा सकता है ?
क्या भाषाओँ के ज्ञाता होकर-
मन को भी पढ़ना आ जाता है !
क्या कहते होंगें गुलमोहर के रंग और वृक्षों के मौन !!
वसंत के विदा होने और वर्षा के आगमन के मध्य
यह पृथ्वी का वैराग्य है ,या शोक ?
पृथ्वी पर जन्मे पहले मानव का आदिम गीत
प्रथम परिचय उसका पृथ्वी से
रात्रि के आकाश में तारों की अनसुलझी पहेली -
भय ,हर्ष ,निराशा या आश्चर्य किसने उसे झकझोरा पहले !!
क्या जल ने उसे प्यास दी ?
क्या मृत्यु के द्वार पर बैठ ,उसने जीना सीखा !
हजारों वर्ष पूर्व के पाषाण जो कथा कहते आ रहे है
क्या इतिहास है ,वही तक सीमित ?
हमने जो कुछ जाना है वह मौन से ही जन्मा है
भाषाऐ मौन का वह हिस्सा है
जो सम्वेदनाओं ,प्रेम और ममत्व को
ह्रदय में समेटते हुए -
आखों से छूटा रह गया है
केवल आँखे ही बोल पाती है वह ,
जो बड़बोले शब्दों से अछूता रह गया है |
48
घर का साथ

मन लौट आया है वापस
पहली बार घर से बाहर निकला – बच्चा हो जैसे |
भूला-भटका, घबराया सा नही –
बस अपनापन ना ढूढ़ पाया हो जैसे |
घर की देहरी पर आते ही फुदका ,
किसी चतुर बहेलिये को छका आया हो जैसे
घूम लिया घर अपना सारा –
थपथपाकर देख लिये खिड़की, दरवाज़े |
सबको पाकर वापस, अपनी जगह पे -
वैसे का वैसा मगन हो सोचा
अगली बार घर साथ ले उडूँगा -
घूमूँगा –फिरूँगा, चाहे जो करूँगा
घर साथ होगा तो नही डरूँगा |

49
बसेरा
शाम का धुंधलका पंछियों को वापस ले आता है
अपने बसेरों में,
हर दिन एक नया दिन होता होगा शायद !
और हर शाम दिन भर की यात्रा से जुड़ी गप-शप, चह-चह |
वे नहीं जीते हैं हमारी तरह,
भूत और भविष्य की चिन्ता में,
तिनका तिनका जोड़ते ज़रूर हैं अपने घरौंदों के लिये
लेकिन अनादि काल से ये घरौंदें उतनी ही जगह घेरते हैं –
जिसमे उनकी छोटी सी दुनिया समाए |
अगर वे सोचते हमारी तरह
तो बदल गया होता घोंसलों का स्वरूप
और पेड़ों पर होते बहुमंजिला -
आधुनिक सुविधाओं वाले घोंसलें
जिनमे से बमुश्किल ही दिखाई पड़ती
यदा – कदा चहकती चिड़ियाँ |

50
हरा जंगल
प्रकृति के करीब है वें इसलिये शायद,
आहट सुन लेते है - ऋतुओं के पदचाप की
आज भी चला करतें है सूरज के बताए रास्तों पर
और कहा मानते हैं संध्या का |
अपने नन्हे से असुरक्षित जीवन में
हमसे अधिक सुकून की चहचहाती शामें
इनके पास है |
इन पर थोड़ा अधिक ध्यान देनें लगें अगर
तो हमारे पास जो है ! और जो नहीं है !!
दोनों की कीमत हम जान जायेंगे
हरा जंगल और भूले हुए गीत
हमारे लिए भी है !

51
हरा रंग
देखो हरे रंग का मौसम है
मुझे दिखाई दे रहा है
तुम्हारे भीतर अब भी हरा रंग बाकी है .
बचाए रखना इसे,
भूलना मत, गुड़िया के खेल में
अपने मन के सपने सजाना
बारिश के रंग भरे आकाश में,
जीवन के रंग देखना ,
आँगन में गौरय्या की तरह फुदकना
नन्हें फूलों वाली हरी घाँस पर जैसे
फूलो को पैरो के नीचे आ जाने से ,
बचाते हुए चलती थी तुम
जीवन भी ऐसा ही है
बहुत कुछ रौंदे जाने और मुरझाने से,
बचा बचा कर चलना है
तुम्हारे मन की भीगी धरती पर
नन्ही कोमल हरी घाँस है
इसलिये यह सफ़ेद फूल तुम्हारे लिये है . केवल तुम्हारे लिये
सपनों के पीछे चलती आई हो
जीवन की सच्चाई का चुल्हा कड़वा धुँआ और सख्त आँच देता है
सपनों को धूँगियाईआँखों से बहते आँसुओं में बहने मत देना
सपने थोड़े से बौराए ह्रदयों की हरी घाँस पर ही खिलते है

52
गौरैय्या
जब झुंड में बतियाती है गौरैय्या
क्या कहती होगी ! चह - चह से ?
क्या सुबह की पहली किरण के बारे में
या संध्या में डुबकी लगाते सूरज पे -
टिकी होती होगी बातचीत !
या पता बताती होगी सखियों को,
उस आँगन का -
जहां आज भी फैलाए जाते है मुट्ठी भर धान
और मिट्टी के कुल्हड़ में जल -
कि चहकता रहे घर - आँगन |
नन्ही गौरेय्या को देख घर का नन्हा
जब किलकता है ख़ुशी से
माँ देखो चूं - चूं चिड़ियाँ !!!
कोई भी माँ नहीं ढूँढ पायी
नन्हे को इतनी ख़ुशी देने वाला कोई खिलौना |
घर - आँगन में है जबतक चहकती चिड़िया
और किलकता बचपन,
हम भविष्य के बारे में बतिया सकते हैं -
जैसे पेड़ों की शाखाओं पर बतियाती ये चिड़ियाँ |
53
मृत्यु
जीवन के रंगों के बहुत पास
एक रंग है रहस्य का मृत्यु
चलती है साथ साथ मिलाकर लयताल
कभी परखती है हमारे पदचिन्ह
तो कभी तौलती है सपनों को -
हमारा लड़खड़ाना शंकित हो जाना
लक्ष्य के करीब होकर भी थककर लौट आना
रौशनी की सारी खिड़कियाँ बंद कर
अंधकार को ही अपना सच बना लेना
नही देख पाती वह - रुका हुआ जीवन, अर्थहीन स्वप्न
मायूस तो होती है पर ,अगले ही पल
किसी कुशल माली की तरह
उखाड़ फेंकती है मुरझाया हुआ जीवन
पृथ्वी को लौटाने एक नवल अंकुरण
हम मृत्यु के आने से नही मरा करते
जीवन में सपनों पर समाप्त हो चुके विश्वाश से
मृत्यु की देहरी लाँघ जाते है |
54
स्त्री का घर
एक दिन घर की ओर जाने वाले रास्ते पर -
बहोत देर तक चलते हुए भी ,
घर दिखाई नही दिया
रास्ते से पूछा मैंने -
क्या मै गलत हूँ ?
या तुम गलत हो ?
रास्ते ने कहा - नही सबकुछ ठीक है
ना तुम ग़लत हो , ना मै
बस - तुम एक स्त्री हो..........
55
धड़कते रिश्ते
हर रिश्ते की एक उम्र होती है
पहले अंकुरण फिर बढ़ने - खिलने और ,
फिर कई मोड़ -जिनसे गुजरते हुए कभी कभी हम ,
खुद को ही भूलने लगते है |
शायद उसका मुरझाना हम नही देख पाते-
जिसके खिलने को हमने जिया हो |
मुरझाये हुए फूल केवल -
धड़कते हुए रिश्ते की पुरानी डायरी में ही -
अच्छे लगते है -
और इस रिश्ते को हम ,
अपने जीवन से भी अधिक चाहते है |
56
कैसे कहूँ मैं
कुछ कहना चाहती थी मै,
ह्रदय के अभाव में वे सुन ना सकेंगे
धरती के बाद सृजन मेरा अधिकार है ,
वे निरंतर मशीनों को गढ़ रहे है
उनके घर स्वर्ग से है और,
टूटते दरवाजों वाले घरो में जागती हुई नींद मेरा यथार्थ
जिसमे जंगली तेंदुए की तरह
घुस आती है आपदाए
कैसे कहूं मै ? जो कहना चाहती हूँ |
57
वक्त
वक्त हमारे आसपास से गुज़रता है
और हम बीतते जाते हैं |
वह अनुभवशाली रहेगा हमेशा ही
हम अपने जीवन की लम्बाई जितना ही -
जान पाते है उसे ,और वह बस है
शायद हमेशा से ही ?
कुछ किस्से सुना करते है अतीत के ,
दुस्साहस कि - सपनें भी पल रहें है भविष्य के
उद्गगम और अंत रहित वह जानता है -
कहानियाँ अनगिनत |
उससे हार - जीत नही ना ही शिकायत है कोई
एक नन्ही सी उड़ान है उस आकाश के लिये
जिसका अस्तित्व है अशेष
इस प्रयास में जिया गया जीवन और प्राप्त होने वाली मृत्यु
समय पर हमारे पदचिन्ह होंगे |
हमारे बीत जाने के बाद भी |
58
शब्द मुझसे पूछते नहीं !
मै जब कुछ भी नहीं कर पाती हूँ ..
तो बड़ी ही उम्मीद से शब्दों की बाँट जोहती हूँ ,
वे होते है आसपास तो -
कुछ अच्छा कर पाने का हौसला बचा रहता है |
वे ....मनमौजी है बड़े !!
इतने आसां या सीधे भी नहीं -
के ताकत की गोलियों सा गटक लिया उन्हें !
वो जानते है ,उनमे रूह बसा करती है मेरी ...
उनसे नहीं कहूँगी कभी कोई आधा सच
आत्मा ,प्रेम ,ह्रदय और शब्द -
मुझे एक ही अर्थ लिए अलग -अलग नाम से लगते है !!
मै जब भी बिखरने लगती हूँ ....
मुझे माँ की तरह थपथपाकर ,
फिर साथ ले चलते है ...
उनके आगे किसी कमज़ोरी का बहाना चलता नहीं ...
क्योंकि - शब्द केवल अपनी कहते है !
मुझसे कुछ पूछते ही नहीं !!
59
बुझे हुए दिन से क्या पूछना !!
मृत्यु का हाहाकार... और जीवन की मधुर तान
एकसाथ कैसे संभालती है धरती ...
कभी- कभी लगता है सबकुछ नष्ट हो जाने के लिए है ,
वहीँ एक नन्हीं सी कोपल.....
झाँकती है, मृत्यु के संसार में और जीवन फ़ैल जाता है बंज़र जमीन में !
हर क्षण जीवन है और मृत्यु उसके द्वार पर ....
हर बार जीवन को चुनते है हम ...मृत्यु उसके साथ जुड़वाँ आकार !!
क्यूँ भागना ? क्यूँ है आतंक इतना !!
जीवन अनोखा रंग बिरंगा
के बार- बार डूबे ....रंगों में समाये –राग, रस- भोग ,
उम्र बीत गई कब, खुद ही न जान पाए !!
वह खड़ी रही चुपचाप .....
थपथपा रही है अब ...थककर सोये आकारों को
यहाँ कोई रंग नहीं, भोग नहीं पीड़ा नहीं ..
आकारों के कोई नाम भी नहीं !!
उनकी संतानें उनका नाम पुकारती है
धरती के जीवित हिस्से से आवाज़ सुनाई देती है ...
वे कभी हुआ करते थे ...
क्या आकार मृत्यु की गोद में सुबकते है ..
जीवन की ओर मुड़कर देखते है ?
कहाँ है नई कोपलों वाला धरती का हिस्सा !
कहाँ है सवेरा ? रौशनी कहाँ है ?
उनकी संताने फिर से उन्हें पुकारती है ....
कोई उन्हें समझा रहा है -दिन बुझ गया है
कि अब बुझे हुए दिन से और क्या पूछना ....
क्या हम गर्भ में है !!
वह गुनगुना रही है ...
कौन ? मृत्यु ?........
नहीं माँ !!
60
हरा
आज ..फिर एक सुबह है !
आवाज़े है- मासूम चिरपरिचित और कुछएक बेचैन करती हुई
दिन फिर खड़ा है , कल किसी तरह ख़त्म किया था .....
अपनेआप से कहा था बहुत कुछ - जब उम्र नासमझ थी
हैरानी तो इस बात की है कि ....
वही हो पाए है -जो नासमझी में तय किया था !!
समझ बढ़ी तो रोकने लगी ....के जीवित रहना ज्यादा है ज़रूरी !
अब दो हिस्से है एक ज़िन्दा है और एक ज़ुनूनी
जैसे कोई प्रेत हमेशा साथ चल रहा हो !!
प्रेत की छाया में जीवित आवाज़े सुनाई नहीं देती है
और लोग लगातार कुछ कह रहे है !
प्रेत कुछ कहता नहीं !
मैं हैरान हूँ -
मन केवल प्रेत की सुन रहा है !!
कहता है अभी सब हरा है
चुनो उन रास्तों को जहाँ जाने से भीड़ रोकती है ...
भीड़ के पीछे चल रहा जीवन मुरझाने लगेगा
मैं प्रेत हूँ .....मैंने मृत्यु के पार देखा है !!
तुम मृत्यु को चुनों ...
चुनाव तुम्हारा होगा - तो जीवित रहोगे
जीवित रहोगे हमेशा उन पलों में जो अभी मुरझाये नहीं है
वे हमेशा यही करते है ..प्रेत भगाने के उपाय !
जला डालते है सबकुछ जो कभी हरा था
चलना उतना ही है ....जितनी राह तुम्हारे हिस्से की है
फिर किसी और के डर की सवारी क्यूँ ?
उड़ना है तो उड़ - न उड़ सके तो चल ,
न चल सके तो गिर .....समा जा धरती में !!
की, फिर एक नया अंकुरण तो होगा !
सपनों के जल जाने से केवल राख ही बचती है ..
अपनी राह चल ...शरीर तो राख होना ही है
जब तक है साँसें - मन तो हरा रहेगा !!

61
अपनी बात कहो
वह जा रहा था ... एक सूने अंजान रास्ते पर
क्या उसे नहीं लगता है डर ....
क्या वह प्रेम में है !!
जो दीवानों सा चला जाता है !
वह हासिल कर लेगा
सर पर कफ़न बाँधे निकला है जो ,
वह भला किसके रोके से रुकेगा !!
हाँ तुम देखोगे ....मै देखूंगा -
देखेंगे हम सभी के वह अपनी मंजिल पर होगा !!
अब बजाओ ताली !! करो आवाज़ बुलन्द -
और पुकारो उसका नाम के हमें नाज़ है तुमपे
वह नहीं सुनेगा , तुम्हारी आवाज़ भी नहीं पहुचेगी वहाँ
और तुम ''खिसियाकर '' कहोगे साला बदल गया ...
उसने तो पूछा था तुमसे ,एक नहीं कई- कई बार
तुम्हे आकाश समझकर , धरती का जानकार समझकर !!
वह राह ढूँढता था ....तुम कदम पीछे लेने को कहते
अपना स्वप्न कहता था तुमसे ....तुम मसखरी किया थे करते
तुमसे निराश लौटा था वह ......तुम अब कहते हो फिरते -
मुझसे मिलकर ही तो चला था वह !!
भला कहो या बुरा कहो -
हर बार उसका ही ज़िक्र उसका ही नाम क्यूँ ?
लौटो इसबार कुछ देर के लिए अपनी ओर
तुमसे जो करना छूट गया है .......देखो उस ओर
सच कहो अपने आपसे , सच कहो अपने सपनों से
एक और मुसाफिर चल पड़ेगा ......
मंजिले किनारों पर बैठे उस्तादों को नहीं ,
दीवानें मुसाफिर को मिला करती है !!
इसलिए ऐ दोस्त .....इसबार अपनी बात कहो ।
62
नाम होंगे भी या नहीं !!
क्या नाम होंगे !! उन लोगों के जो कभी यूँ ही ग़ैर इरादतन -
बस ..गुजर जाते है आस -पास से होकर !
वे घर, जिनके करीब से निकलते हुए उनकी ज़िन्दगियों में -
झांक लेने का , जाने क्यूँ अक्सर हो जाता है मन  ...क्या उन घरों के आकार हमारा मन पहचानते होंगे ?
अजनबी शहर ,अंजाने लोग ..पराया देश
क्यूँ वहाँ ..सेंध लगाने को मन हो आता है !!
जहाँ कोई पहचानता न हो वहाँ जाकर ....
अपने भीतर यह किसे ढूंढना चाहते है हम ?
कितना छोटा है यह जीवन !!
हम ठीक से अपना शहर भी पहचानते नहीं ...
कल की सुबह, हमारी सुबह होगी भी या नहीं
इतना भी बस में नहीं है और -
पीढ़ियों का फैसला किये जाते है !!
बहोत शौक से नाम रखा करते है -
आने वाले नन्हे फरिश्तों का ...
जिनकी मुस्कुराहटे कहती है-
हमारा तो कोई नाम नहीं है !!
यह सच है न, तब तुम भी भूल जाते हो उनके सामने अपना नाम !
अधिकार से लिखा करते हो जिन कागज़ों पर अपने नाम ..
कभी टटोल लिया होता उस नाम के पीछे छिपा मन ?
क्या यही होना चाहते थे ?
अगर नहीं तो चल पड़ो अब भी !!
सच्ची ख्वाहिशों को उम्र की फिक्रें नहीं हुआ करती
यह वह अकेली किताब है जहाँ तुम्हारा -
जीने का ढंग लिखा जाएगा !!
नाम ..पता नहीं होंगे भी या नहीं !!
63
क्या मौसम हमें छोड़कर चले जाते है !!
अचानक किसी एक पल में एहसास होता है ... यह समय दोबारा नहीं आएगा ।
और हम उस क्षण को ज़ोर से भींच लेना चाहते है !!
वह दोबारा आता भी नहीं .....
हम है बस है ,कब  “थे” हो जायेंगे शायद जान भी न पाएँ ......
फिर भी कितनी कवायदें है इस अनिश्चित से जीवन के लिए !!
चलो थोड़े से सरल हो जाते है !!
धूप ,फूलों की सुगंध हरियाली और चांदनी रात से अपनी झोली भर लाते है
एक बार फिर से बचपन सपनो में झाँक जाये -
मन के आँगन में इतनी मासूमियत बचा ले जाते है !
तुम पढ़ो मुझे तो सुनो एक गुड़िया का बचपन
मैं सुनूँ तुम्हे तो गुनगुनाने लगूँ
तुमसे रोज़ कहूँ अपनी हर इक छोटी सी बात
फिर भी लगे कि कितना कुछ कहना है छूट गया !!
हर नए दिन के साथ बाकी रहे - कहने को प्रेम नया
तुमसे विदा होने के आखरी पल तक लगे ....
तुम्हारे प्रेम को कितना थोड़ा है जिया !
फिर भी सच है आखरी यही ....हर नए दिन के बाद आने को है तैय्यार एक और दिन ,जो उसदिन होगा नया ।
कही जायेगी नई कहानी कोई , निभा रहा होगा किरदार जीवन का कोई पात्र नया !
यह मौसम जो शुरू हो रहा है कल लौट जायेगा ...पीछे से आता होगा नया ।
क्या मौसम हमें छोड़कर चले जाते है ?
नहीं ..
वो फिर लौटकर आते है और जाते - जाते दे जाते है एक और मौसम ....
जीवन का एक रंग नया !!
64
बारिश तुम्हे सुन रही है !!
कहो जो नहीं कहा है ... और गुज़र गए है -
लम्हें हज़ारो हज़ार
नहीं कोई कहीं नहीं है , जो उठाए सवाल
कि ........तुमने कैसे पूछ लिया सवाल !
कहो उसी सरलता से .......जितनी सादगी से प्रेम हो जाता है !!
प्रकृती गरजती है ,बरसती है झूमती है लय में ...
तो कभी - सारे बाँध तोड़ देती है
तुम बूँद बूँद कबतक बरसोगे चुपचाप !!
अपना होना सुनो और कह दो सबसे  ...
तुम्हारा तांडव कुछ नया रचेगा !!
पृथ्वी पर पूजे गए है देव हजार
तुम मानव ही बने रहो ....
किसी को तो खोलने होंगे देव - द्वार
लेकिन रूको .....पूरा सच न कह देना !!
कर दिए जाओगे शहीद
चौराहे पर होगी एक और प्रतिमा
न देव बन पाओगे न रहोगे मानव ।
बारिश से कहना वह तुम्हे चुपचाप सुने
सुने तुम्हारे गीत और आर्त्तनाद
कहना उससे के तुम भी हो उसका ही हिस्सा ,
कैसे रह सकते हो निशब्द निष्प्राण !!
वह कहे अगर तुम्हे सागर हो जाने को
....तुम बन जाना एक नदी या एक ताल -
वे बसेंगे तुम्हारे आस- पास, जो प्रश्नों को उगने नहीं देते है !
उगाएंगे फसलें तुम्ही से सींचकर !! और गाएंगे एक गीत बारिश के लिए तुम्हारे होने के लिए !!
तुम उनकी क्षुधा के रास्ते जाकर उनका रक्त बिंदु हो जाना
 तब वे ही तुम्हारी बोली बोलेंगे ,तुम्हारे प्रश्न पूछेंगे !!
बारिश तुम्हारा अंकुरण सुन रही है ...
65
कुछ नया कहो अपने बारे में !
बादल सूरज चिड़ियाँ ....धीमे - धीमे बहती हवा
बगीचे में खड़ा आम का बड़ा पेड़ !
पेड़ पर लटकती घंटियाँ ,
हवा के साथ नाचती पुतलियाँ
ध्यान से देखो ....हर रोज़ जाने कैसे !!
उनमे कुछ नया सा है !!
मुझसे कहती है कविता ....
मुझे फिर -फिर कहो ....हरबार मैं देखती हूँ कुछ नया !
चलो हम भी कविता हो जाते है
देखें हर बार हर दृश्य में नया !!
कविता हमारे पास लौटकर बैठ गयी चुपचाप ...
बरसों पुराना है साथ ..जाने कैसे ढूँढ़ लेती है
हमारे बीच वह ...हर बार कुछ नया !!
66
माया
चारों ओर सूने पहाड़
दूर तक सिर्फ तुम ,अकेली ..
तेज़ बहोत तेज़ उड़ती हुई हवा
तुम्हे कण- कण करती हुई - या फिर
तुम्हारा हर कण समेटती सी ...
शायद-
प्रेम में है तुम्हारे !!
धरती हवा पानी प्रकाश !! सारे ही ?
माया कुछ कतरे रहने दो अभी
तुम्हारा अद्रश्य आकार !
किसी पल में तो ठहरा होगा कहीं ...
वह एक पहर से दुसरे पहर डुबकियाँ लगाती है
जब तक पहुँचना होता है उस तक वह -
हदों के पार चली जाती है !!
उम्र इस तरह गुजरी है छूकर उसे
के देखो तो लगता है
अपना चेहरा पीछे भूल आई है ..
मेरा मिलना उन दोनों से हुआ है
बीच के गुम हुए वर्षों में चेहरा नहीं है !!
मै उसका किरदार रच रहा था ..
वह खुद किरदार होकर चली गयी
अब जो माया है, वह एक गहरी कविता है
जो कभी -कभी मेरा हाथ थामकर कहती है ..
आगे कुछ लिखा क्या ?

67
अगर मैं नदी के पास नहीं जा सकी
क्या नदी मुझसे मिलने घर आएगी ?
कितनी यात्राएँ की है तुमने ...
पर्वत ,घाट ,जंगल -उजाड़
कितनी शक्ति है तुममे !!
ना रखो मेरे आगे इतनी बड़ी शर्त ...
मै बंजर जमीन पर खड़ी डूब रही हूँ !
एक बार मुड़कर देखो मेरी ओर
चट्टानों से रूठकर तो बहुँत बार मुड़ी हो -
तुम्हारी राह देखती है एक छोटी सी लड़की !!
जो रोज़ उठकर तुम तक पहुंचना चाहती है
नंगे पाँव बंजर रास्ते नाप रही है ....
कुछ नहीं कहना है ..कुछ चाहिए भी नहीं
किसी से कहूँगी भी नहीं -के
नदी मुझसे मिलने घर आती है !!
हो सका तो तुम्हारे साथ तुम्हारी धारा में जल हो जाऊँगी..
जो अपने पूरे जीवन, नहीं आ सके है तुम्हारे पास
उन सबको मै तुम्हे- बूँद बूँद बाँट आउंगी !!
देखना बंजर हरा हो जाएगा !!
आकाश गरजेगा फिर एक बार
तुम्हारी बूंदों में होंगी सैकड़ों जल धाराएँ !!
तुम्हारे साथ बूँद बूँद जी उठूंगी मै भी |
नदी जब मिलने आती है ...एक छोटी सी लड़की
नदी हो जाती है .....
68
दिन ....टुकड़ों में
कितने हिस्से है....
लगता है , मैँ अपने-आप को नहीं जानती !!
कुछ शब्द चौंकाते है -
मैं जो कहना चाहती हूँ ..वह मेरे शब्दों में होता नहीं !
और शब्द जो कह रहे होते है उनमे मैं नहीं ।
मैं निशब्द हूँ !! कैसे सुनोगे ?
मैं कुछ नही से शुरू होती हूँ...
जो दृश्य में नहीं उसे देखोगे कैसे !
मैं मृत्यु - शैय्या पर लेटी एक देह हूँ....
तुम्हारे हाथ मुझे अग्नि दे सकते है ... और कुछ नहीं ।
मैं नीले पानी ,नीले आकाश नीले रंग में -
बहती आ रही हूँ ...
तुम्हे लगेगा मैं साथ हूँ ,आहटों को छूना मत
मैं गंध हो जाउंगी ।
कभी तुमसे अपनी ही शिकायत करूँ ..
मुझे कोई सलाह मत देना
कुछ मत सुधारना !
उन सारी शिकायतों में मैं रहती हूँ
मुझसे मिलना हो ...तो संवर कर मत आना ।
आना टुकड़ों में जैसे दिन आता है ...
बिना कुछ कहे की अगले पल में क्या है !!
एक पल से दुसरे पल की छलांग के बीच
जहाँ कुछ नहीं होता है !!
मैं अपने हिस्से बटोरकर सँवरें  चेहरों के बीच
जानें कैसे मज़बूती से खड़ी हो जाती हूँ !!
उनके  चेहरे गहरी दरारों को ढँकना जानते है
अपने टुकड़ों को समेटना नहीं ...

“वह” चमकता है हरबार, नया है हरबार !!
समेट लेता है मेरा कही नहीं होना
“दिन” .....टुकड़ों में !!


69
आकाश स्त्री से कभी नहीं कहेगा
वह ..एक स्त्री की तरह नहीं सोचना चाहती थी !!
वह अदृश्य पंखों वाली ,नन्ही चिड़िया थी
सुबह दोपहर शाम और काली रात ...
अपने आँगन में बो दिए थे -
सारे उसने !!
सुबह पहले जागी ! दोपहर की अलसाई कोपल उसके बाद
शाम की टहनी पर सिन्दूरी फूल खिला !!
तो चाँद को मना लायी काली रात |
एक स्त्री जब धरती से बात करती है ..
उन्हें सुन रही हवा - जीवन हो जाती है|
वह स्त्री जो चिड़िया हो जाना चाहती थी ...
दूर से आ रही ...माँ माँ की पुकार सुनकर
घर की ओर लौट गयी ..
धरा - घोंसलों की ओर लौटते पंछियों को देखती है
स्त्री के लौट जाने से सारा आकाश खाली है !
स्त्री उस आकाश का हिस्सा कभी नहीं थी -
आकाश पंछियों की बपौती है
स्त्री के पास आँगन है ,
जिसमे बैठी वह एक गीत गाया करती है
और थपकती है सोये हुए अंकुरों को
धरती स्त्री की आवाज़ में छिपे सपने को जानती है !!
वह स्त्री होकर !! नीले आकाश की ओर उड़ गयी !
स्त्री - स्त्री की तरह सोचना नहीं चाहती थी ..
वह चिड़िया हो गयी थी !! घोसले की ओर लौटने वाली ..
धरती का एक हिस्सा - स्त्री होकर आकाश में चाँद से जा मिला
और वहीँ ठहर गया !
नन्हें चूजे स्त्री की गोद में दुबक कर -
आकाश को भूल गए है !!
स्त्री अब भी धीमी आवाज़ में गा रही है
धरती का टुकड़ा चाँद से झांककर स्त्री का माँ में बदलना देख रहा है
आने वाले जीवन के लिये ..स्त्री के गीतों के लिये ,
आकाश स्त्री से कभी नहीं कहेगा ,
वह उड़ सकती है ...
70
पतझड़ के सूखे पत्तों के आकार
पतझड़ के सूखे पत्तों के आकार ...कभी हरी नयी कोपलें रहे होंगे !
हम बदलाव नहीं रोक सकते ...
अपना ठहर जाना तो रोक सकते है ।
हवा पानी धरती आकाश
हमारा होना देख रहे है ...
मिट्टी पर चलते हुए
बादलों की बातचीत है !
मिट्टी पैरों का साथ दूर तक नहीं छोड़ती है !!
और हम बादलों के स्वप्न ..
इतने - के बादल कत्थई होकर बरस जाते है
भीगती हुयी माटी सुगंध हो जाती है
और हमें लगता है हम बादलों पर है !!!
हम बादलों पर है ...धरती पर पतझड़
धरती का पतझड़ सच कहता है ...
हम आकार बदलते बादल को सुन रहे है
हो सके ...तो पतझड़ को सुनो !!
वह काले बादलों के लिये गीत रच रहा है !
बारिश उसके गीतों की बाट जोहती ,
गर्म हवाओं के आस पास कहीं छिपी हुई है !
पतझड़ के सूखे पत्तों के आकार ..
तप्त धरती पर हवाओं से बिखरते हुए सरसराते है जब -
मौसम से विदा लेते हुए , बारिश का आना लिखते है !!
71
तुषार के लिये !!
शाम ..कुछ देर ठहर,
कितनी जल्दी है तुझे बीत जाने की !!
बार बार अपनी झोली में समेटती हूँ - पल
पल - जो कुछ कहते नहीं ..
मुझे मेरी रूह लौटा जाते है |
उन्हें देखकर लगता है -
हाँ सचमुच में जी लिया है !
बचपन , जो घर -घर खेलता है ...
खेल का समय ख़त्म होनें पर
घर एक झोले में समेट लेता है !
चलो.... ज़्यादा दूर नहीं जायेंगे हम ,
हम होंगे ,घर होगा, कन्धों पर दो पंछी !!
हमारे बीच के समय को इससे अधिक -
और क्या चाहिए !!
एक यात्रा ..जो कभी सीधी राह न पकड़ेगी !!
मुड़ेगी अनजानें से मोड़ों पर
हम कहीं नहीं पहुचेंगे !!
हम मंजिलों के लिये नहीं चले थे ...
हम साथ है और चल रहे है
हमारे बीच वे पल है जिन्हें जल्दी नहीं है बीत जाने की ..
कांधों पर बैठे पंछी चहचहाते है !!
मेरे झोले में घर है , रुको ...
कहीं बैठकर चाय पीते है !!
72
तुम्हारा कहना
कभी - कभी ... कुछ सुनाई नहीं देता है ,
कुछ भी नहीं ... !केवल आँखें देख रही होती है ..

बहुत ध्यान से देखो अगर
तो सुबह का दोपहर में -
दोपहर का शाम और शाम का -
रात में घुल जाना भी दिखाई दे जाता है !!
कभी - कभी यूँ भी लगा करता है ..
कि बस दूर तक फैला हरे घाँस का मैदान हो
और धरती के बिछौने पर पड़े हुए हम -
नीले आकाश के सिवाय कुछ न देखें !
और सुनें केवल ..
आस-पास मंडराते जुगनुओं की रौशनी !!
बहुत दिनों से कुछ कहा नहीं तुमने !
कई बरस बीत गए .. हम घंटों बतियाया करते है !
हर दिन जाते हुए कहता है -
कल कुछ देर और ठहरूंगा
कल पूरी कह देना अपनी बात !
पर तुम कुछ नहीं कहते !! केवल मुस्कुराते हो !
जब तुम्हे सचमुच कुछ कहना होता है ...
तुम कुछ नहीं कहते हो !!
तब मुझे भी, कुछ और सुनाई नहीं देता है ...
कुछ भी नहीं -
और हम... यूँ ही बतियाते हैं घंटों !!
दिन का आना और जाना ... सुना नहीं हमनें
गुज़रते मौसम दरवाज़े पर अपना आना लिखकर लौट गए !!
हमारे साथ रह रही पीढ़ियों की उम्रें पकने लगीं !
जानें कितनी दस्तकों ने नाराज़गी रख छोड़ी है....
हमारी मदहोश चौखट पर !
मैं ..कैसे यकीन दिलाऊंगी उन्हें ?
कि सबके बीच होते हुए भी-
तुम्हारी मुस्कराहट के सिवा ...
मुझे कुछ सुनाई नहीं देता है !!
कुछ भी नहीं ...
73
ज़िन्दगी  
बस ऐसे ही ....बंजारों की तरह ही ठीक है !
फक्कड़ बेबाक अलमस्त !!
कल जो हमारा कभी नहीं होता ...
उसके गुणा -भाग में डूबे हम
अपने ही ख़्वाबों को निचोड़ कर डाल देते है-
किसी और की सलाह पर !!
ढूँढ़कर कड़ी घूप ...
के टंगे रहो तब तक -जब तक
हसरतों का एक एक कतरा न जाए सूख !
जो सचमुच में सफल होते है जीवन में ...
वें दूसरों का जीवन नहीं गढ़ते होंगे !
क्योंकि वे ही समझ सकते है
एक नए सपनें नयी कहानी की कीमत !!
जिसे हम अपना जीवन देकर चुकाते है
फिर हरबार हम अपनी कहानी का अंत दूसरों से
क्यूँ पूछनें जाते है ?
बहोत सी कहानियाँ दम तोड़ रही है ...
चलो एकबार फिर बचपन में झाँक आते है
कहाँ तक पहुँचना हो पायेगा पता नहीं !! मगर -
अपनी कहानी खुद लिखूँगी और अंत भी अपनी पसंद का झपट लाऊंगी ...
तमाशा हम खुद सजा सकें तो बात है !!
दूसरों के लिए बन गए है अगर ...तो बस बीतते हुए दिन और रात है ।
74
आज़ाद
हम सभी रहना चाहते है !
बस, दूसरों को नहीं देख सकते है!!
खुशियाँ ढूँढते है इतनें बेचैन होकर ...कि ...
रहा सहा चैन भी खो जाता है
और जब पड़ोस से आ जाती है -
ठठाकर हंसती आवाज़ ...
तो उन्हें रुलाने चल पड़ते है !
अपने किये हर गुनाह के लिए सहिष्णु हम ...
किसी और की हर हरकत को गुनाह कहते है !!
कभी ग़लती से मांग बैठे जो सलाह वो ...
तो बड़े से बड़े गुनाह को वक्त की मांग कहते है ?
कैसे रहेंगे और कहाँ ?......
खुश हम , ख़ुशी तो सादगी के लिबास में छुपी बैठी है ...
और आजकल डिज़ाइनर नहीं पहनने वाले को
भीतर आने नहीं देते है,  हम !!
हाँलांकि - घर के बाहर तख्ती पर लिखा हुआ है .....
"अपना घर"
75
बारिश !!
यह मौसम नहीं है उसका ...
क्यूँ लगता है ! मौसम के साथ कोई और भी-
पीछे छूट गया है |
दोस्तों का जमघट !!
बेसिरपैर की बातें घंटों ...
चाय - समोसे, तली हुई हरी मिर्च के साथ !
जो जितना झपट ले जाय |
अब कटोरे में डायट फ़ूड लिये सोचते है ...
बारिश न ही आये तो अच्छा है ..
न पकौड़िया है ना उसे झपटने वाले दोस्त !
याद करने लगो तो लगता है ..
सबकुछ पीछे छूट गया है !!
मित्रों के लिये ...

76
वे शब्द ...
वे शब्द.... जो कहने से छूट गए
हमें लगा ..ठगाए से बैठे होंगे भीतर कहीं |
वक्त बिना आवाज़ चुपके से गुज़र गया
जिन्हें कह दिया था ..वो अब बीती बातें है
वे जिन्हें कहा नहीं - जाने कब अंकुरित हुए !!
और अब लहलहाते है ,बेलगाम |
कभी कभी जब ..कुछ नया सोचनें से ठिठकता है मन
पहचाने रास्तों पर ही लौटता है बार- बार ..
दुबक कर बैठ जाता है , घर के सुरक्छित आकार में -
झिंझोड़ते है वही विचार ,उड़ाते है खिल्ली
आँखों में ऑंखें डाल निचोड़ लेते है -
सारा डर, पलायन और मक्कारी !!
रास्ता नहीं है और कोई सिवाय चल पड़ने के !
अपने भीतर मत दबाना कभी उन शब्दों को -
"जो क्रांतिकारी हो"
चुप नहीं बैठेंगे वें ..न आज
और ना आगे कभी ...
77
अधूरा ...
अधूरा ! यह शब्द कुछ कहता है !!
अचानक कुछ पल ,ठहरते है हम ...
भीतर कोई देखता है हमें
जैसे बहोत देर से पुकार कर थक गया हो ..
और हमने आस टूटने की आखरी कड़ी को थाम लिया हो !!
कभी कभी ऐसा क्यों लगता है ?
सबकुछ अधूरा रहने को बना है जैसे ..
अधूरा है तो कहानी है !
पूरा हो गया ...तो आगे अंत है ?
मेरे भीतर के मैं को जो ,भागमभाग है
मुझे डर लगता है उसके लिए !
तस्वीर पूरी होने पर ....
बांध दी जाती है चारों ओर से -कि
अब और कोई रंग नहीं ,विचार नहीं !
मैंने सोचा है मैं अधूरी कहानियां लिखूँगी !
वह एक मोड़ पर आकर ठहर जाया करेंगी ....
शीर्षक और अंत के बिना वो किताबों में तो नहीं ,
हाँ मुझे सुननें वालों के ख्यालों में
किसी करवट साँस लेती रहेंगी !
किसी दिन सारी अधूरी कहानियों को समेट
एक पूरी कविता लिखूँगी ...
और मेरे भीतर एक चित्र , एक कहानी ,
एक जीवन पूरा हो जायेगा |
78
भय से घिरे लोग जब देखते है
एक सहज व्यक्ति ,जो गहरी साँस लेता है -
और कुछ नहीं चाहता समाज के ओहदेदारों से ,
वह देखता है- सुबह, दोपहर, शाम कैसे समा गई है उजियारी रात में और
धीमे से बदलता है करवट किसी और के सपनों के लिए -
शायद जगा रहता है सारी रात !
आरोप घृणा क्रोध अपराध ,इन सबसे थके हुए मन
वह चुपचाप देखता है .....
और लिखता है ,
उसके लिखे गए शब्द जो कहते है -
थके हुए मन उसे बार - बार पढ़ते है और सो जाते है गहरी नींद, जैसे नवजात !!
भय की फसले तेज़ धार वाले हथियार से काटते हुए
कितनों ने उखाड़ फेका है समझकर खरपतवार अपना ही मन !
ह्रदयहीन वें, धड़कते प्रश्नों पर लगाते है -ठहाके !!
घर लौटकर ह्रदय से खाली हुए आकार में थपथपाकार सुला देते है एक और प्रश्न |
उनके घर चमकते है इस तरह - जैसे कभी कोई आया न हो वहां !!
वह शब्द गढ़ता है भावों को छोड़ देता है बेलगाम -
पशुओं को बाँधा जाय तो भी दरकता है मन ...
यहाँ बाते की जाती है जीते जागते इंसान की और बाँध देते है -पहले ही उसका आत्म !!
वह फिर भी लिख रहा है ....उसके सर पर मंडराते है बाज़
वह सर उठाएगा और खो देगा - अपनी आँख या दोनों आँखे ...
देखा जाएगा ....कितनी बार सर उठाएगा !!
भय से घिरे लोग जब देखते है नज़रे नहीं उठाते है ....
बाज़ उन्हें दृष्टिहीन समझकर , कही और उड़ जाते है !!
 (उन तमाम रचनाकारों के लिए, जो आज के समय में निर्भीकता से लिख रहे है - डर की फसलें उगाते लोगो व सर पर मंडराते बाज़ो के बावज़ूद !! )

79
गिद्ध दृष्टि
गिद्ध की दृष्टि तुम्हारे सपनों पर है !
उसे पता है .. भोजन वहीँ मिलेगा ,
तुम्हारी भूख से जब तक -
सपनों का अंकुरण होता रहेगा
तुम जीवित रहोगे !
तुम जो जी रहे हो ,
क्या सोचते हो ?
जन्म लिया है, इसलिए जीवन है ?
भूख ..हर जन्म और मृत्यु पर भारी है
वह रचती भी है , और लील भी जाती है !
भरोसा नहीं होता फिर भी !!
हर भूख और मृत्यु के मध्य एक जीवन है
कुछ देर के लिए विराम की तरह |
बस इतना ही है
इतने में ही चुराना सीख लोगे अगर
अपने जीवन से अपना समय ,
तो वह तुम्हारे आगे अपनी केंचुली छोड़
घिसटता हुआ चला जायेगा |
वह कोई भी हो नज़र उसकी -
तुम्हारे सपनों पर ही है |
इसलिए कहता हूँ !
कभी पेटभर मत खाना |
80
एक अच्छी कविता
क्या एक अच्छी कविता का भी समय होता है !
अगर होता होगा !! तो मेरा और तुम्हारा -होना ,
केवल होना, बिना किसी प्रश्न के
एक अच्छी कविता के पढ़ लिए जाने की तरह
हो सकता है ?
बिना किसी सवाल और जवाब के !!
मेरे पास किसी के लिए कोई सवाल नहीं है
क्या इसका मतलब यह है , कि वे
मेरे लिए कटघरा तैयार कर लें ?
मै हरे जंगल से चुपचाप निकल जाउंगी
शांत बहती जलधारा .........
मुझे तुम्हारा नामकरण स्वीकार नहीं |
एक अच्छी कविता के विद्रोह का समय
विद्रोह के परिणाम के बाद भी ....
ठीक ठीक आँका नहीं जा सकता है |

81
समय
कुछ देर थककर बैठ गए अगर -
समय तुम्हे देखता हुआ आगे गया निकल !
हो सकता है वह वापस न लौट सके ........
ऐसा क्या खो दोगे ?
बेबस तो समय है चाहकर भी लौट न सकेगा -
तुम जिस पल उठ खड़े होगे ,
समय को तुम्हारे साथ ही चलना होगा |
82
अपने भीतर
जब मन करेगा लौट आएँगे ...सोचते हुए छोड़ा था घर
कईबार लौटना हुआ लेकिन !
उन दीवारों खिडकियों और दरवाज़ों के बीच नहीं था घर
वह और भी अधिक छूटता गया ...लगा -जैसे खो दिया घर
हम रिश्तो के जिन आकारों से बिछड़ते है -
वे तमाम उम्र न घटते है न बढ़ते है
घर हमारे साथ ही चलता है ....
हमारे आकार में घुला मिला
हम अपने भीतर ढूँढना भूल जाते है !!
83
आपका नया मकान
घर के पहले दिन में –
हरे रंग की सुबह हो !
जिसमे धूप   खिलने पर  
पीला रंग सूरजमुखी सा आँगन में  खिल उठे
दिन चढ़ आने पर –
प्रेम की छत तले  छाँव मिले  
शाम को ढलते सूरज के साथ –साथ
चाँद का आना भी दिखाई दे !
अकेले न बैठे कभी निवास  में
मकान आपको – पिता की छाँव से भरा घर दिखाई दे |
84
दस्तक
समय के साथ चलते हुए ,कुछ देर ठहर कर ! पीछे मुड़कर ,
दस्तक दूँ बीते समय की किवाड़ों पर -
और मेरे अपने -पहचान लें मेरी आहट !
स्वयं के जिए हुए जीवन को मुस्कुराते हुए देखूँ !!
जीवन में इससे अधिक सुखद और क्या हो सकता है ?
85
जब पतझड़ सूना कर जाएगा आँगन का पेड़

जब पतझड़ सूना कर जाएगा आँगन का पेड़ -
दरख़्त हो जाएगी .... वह पतझड़ के बाद की बारिश के बारे में जानती है |
कई परतों में उघाड़ा गया था गर्भ -
नौसिखिया मोची आढ़ाटेढ़ा सिल गया हो जैसे- रह गए है निशाँ...
शरीर का यह चितकबरा हिस्सा उसे माँ कहेगा
वह कुछ और होना नहीं जानती है |
बेपरवाह सा समय आया और आकर लौट गया ...
उम्र दशको को लांघ गई है ,
उसके नाखूनों से खुरच कर बनाए आकारों पर रुका रहा था कुछ देर वह !!
समय के उस हिस्से में अब भी धड़कते है आकार बेतरतीब.... वह जानती है |
कहीं गहरे बहुत गहरे कुछ दरक सा गया है ,
खंडित शिल्प के टुकड़े समेट रही है ...मिट्टी हो चुके आकारों को दोबारा गढ़ना जानती है |
क्यूँ ?
दरख्त हो जायेगी ...
कुछ और होना नहीं जानती है ....
चितकबरा हिस्सा उसे माँ कहेगा .....
पतझड़ के बाद की बारिश के बारे में जानती है .....
आकारों पर रुका था कुछ देर वह .....वह जानती है
गहरे कही कुछ दरक सा गया है ...टुकड़े समेट रही है
क्यूँ ??
ये कैसा सवाल है !!
निर्माण….. उसे अस्तित्व का उपहार है |

86
रिश्तों की सुगंध
वे पगडंडियाँ जो स्मृतियों में, मुझे घर की ओर ले जाती थीं -
अब दृश्य में नहीं हैं !
वह आँगन जिसकी सीमा , मेरे लिए पूरा संसार हुआ करता था कभी !!
अब नये आकार में है, जहाँ - मेरा होना अनुपस्थित है |
रिश्तों की सुगंध अपने साथ बटोर लाई थी मै ,
उसे समय के साथ विलुप्त होना ही था
अब लौटती हूँ और खटखटाती हूँ द्वार
कि समेट लूँ पहचाने हुए आकारों से -
आखों को नम करता हुआ आत्मीय हर कतरा
पर अब मेल नहीं खाते है शायद -
मेरी उपस्थिति के साथ उनके विचार |
निरंतर परिवर्तनशील काल से विवश
परस्पर नवीन आकारों के साथ
उनकी आखों मे भी तो ,छूटा रह गया है मेरा पुराना चेहरा !!
पहली बार लौट रही हूँ ,पढ़कर उनके चेहरों की विवशता -
अगली बार लौटकर अतीत का सुख नही दोहराउंगी ,
बिना किसी शिकायत के -
नये दृश्य में शामिल होकर
नई सुगंध बटोर लाऊँगी |
87
मेरी आवाज़
आज कुछ अजीब सा घटा मेरे साथ
मै बोल रहा था - लोग सुन रहे थे
लोगों ने जवाब दिया - मैंने सुना उन्हें
मै उनसे जो कह रहा था वे समझ रहे थे
उनके जवाबों ने मुझे, मेरे सवालों के होने का ढाढस बँधाया
मै सचमुच वही कह रहा था -
जो मै सोच रहा था की यही कहा है मैंने
अचानक लोगो की भीड़ को छोड़ बेतहाशा -
उलटी दिशा की ओर दौड़ पड़ा मै
लोगो की स्तब्धता भी सुनाई दी मुझे
जिससे घबराकर और तेज़ दौड़ लिया मै
दौड़ता हुआ आ पहुँचा एक बियाबान में
कही कोई न था -ना आदम और ना हव्वा -
ना कोई दूसरी आवाज़
मै फट पड़ा ज़ोरों से चीखा
दहाड़ उठा जंगल को अकेला पाकर
आशचर्य कही हवा की सरसराहट भी नहीं ?
परिंदों के परों की और अदृश्य आत्माओं के -
पलटकर जागने की आहट भी नही
ये सन्नाटा ,ये बहरापन जानलेवा था
मै केवल एक बार अपनी आवाज़ सुनना चाहता था -
जो " दिवंगत " थी
कब की मृत हो , ढो रही थी मेरे संग साथ को
उसकी मुर्दा गंध असहनीय थी
मै आखरी बार ज़ोरों से चीखा
उनके प्रेत मेरे शरीर को ले जा रहे थे
उन सबके कहकहो से मेरे कानों के पर्दे फट पड़े
ये वही थे जिनकी खुशियों के लिये
मैंने उसका दम घोंट दिया था -
मेरी अपनी , "आवाज़ " |
88
माँ का मन
घर -माँ के मन की तरह हँस पड़ा
दरवाज़े पर दस्तक है ,
बेटा घर आया है |
माँ हुलसकर भर लेगी बाहों में -
माथे को चूम ,थपथपायेगी गालों को
कितना दुबला हो गया है रे ? बोल -
पल्ले से पोछेगी छलक आई आँखों को |
बेटा घर की देहरी के भीतर -
चार बरस का हो जायेगा |
पूरेदिन माँ के चारों ओर मंडराएगा -
वह कुछ ही दिनों में पिता होने वाला है ,
बच्चे ने आने से पहले ही उसे -
पिता का ह्रदय देकर -
जीवन में पहली बार ,
माँ का मन समझाया है |
इसबार माँ के बुलाने से नही -
वह खुद चलकर आया है |
89
आज की दोपहर का बस्तर
जंगल- हरा , आदिम , विराट
महुआ के सफेद फूलों से सजता -
सुगंध से बौराया -
रस से भीगा -थिरकता जंगल ,
आज से पहले भी कई बार देखा है आँखों ने -
उसका बीहड़ सोंदर्य -
लेकिन हरबार अबूझा ही छूट जाता है वह
इसबार कुछ और भी था लेकिन,
जो द्रश्य में था पर अनचाहा और असह्य था
पेड़ों की कुछ कतारों के बाद -
धान की भरी बालियों के साथ -
खिलखिलाते हुए ठिठक पड़ी हंसी के पास -
पहले हुआ करते थे युद्ध के मैदानों में -
अब वर्दी बंदूक और पहरे है -
हरे आदिम निर्दोष जंगल के द्वार |
90
जानवर
वह भूखे भेड़िये सा आप पर झपटता है पर ,
मिल जाने पर अपने हिस्से का मांस -
किसी पालतू की तरह शांत हो अपनी राह चल देता है -
जानवर है ,इंसान नही -
हमेशा भूखी आँखों और लपलपाती जिव्हा को लिये-
तहज़ीब के चोले में मृत आत्मा की दुर्गन्ध को छिपाता ,घिघियाता ,और -
मौका मिलते ही सबसे करीबी को -
मुँह फाड़ लील जाता |
पतानही किससे शापित है ?
पीठ पर मृत्यु को लादे हुए - मोक्ष की बाते है करता
मृत्यु तो अटल है सबकी ,इसकी भी लेकिन ,
कर्मकाण्डी है बड़ा -
शास्त्रों की लिखापढ़ी के हिसाब से ,
अपने हर पाप के लिये -एक पुण्य है गढ़ता |
फिर भी न जाने क्यों ? उसकी बजाय ,
भूखे भेड़िये के साथ होना अधिक सुरक्षित लगता -
भेड़िया मारेगा एक बार - तिलतिल कर बारम्बार नही -
जानवर है ,...........इंसान नही |
91
गोद
माँ क्या तेरे पास मेरा बचपन है ?
बहुँत ढूँढा नहीं मिल रहा  मुझे
तूने देखा है उसे कहीं
जब पता  है तुझे ,मै भूलने पर याद नहीं कर पाती हूँ
तूने क्यूँ नहीं संभाला उसे
मैंने सारा घर ढूँढ लिया है
बाहर भी देख आई हूँ
अब केवल तेरी गोद बची है |
92
माँ तेरे साथ
पीली सुनहरी धूप का दरवाजा खोल-
माँ ,
कल मै घर आउँगा
बारिश के आकाश पर चमकती है
रंगीन मछलियाँ
अभी अभी थी दूसरे झूले पर बैठी ,
मुझसे भी बड़ी एक तितली
देखो सफेद बादलो पर जा अटकी-
मैने अपनी पतंग की  डोर है खीची
कितना कुछ है तुम्हे बताना माँ !!
तुमसे मिलने कल मै घर आउँगा
पिछली बार कहा था तूने
यह भी है मेरा घर !!
इस बार घर से लौटते हुए ,
माँ तेरे साथ- इस आँगन में
अपना घर ले आउँगा .
(मानसिक रूप से निशक्त बच्चो पर बनी फिल्म " स्नेह सम्पदा " में अपने परिवार से दूर रह रहे बच्चो के लिये लिखी एक कविता)
93
वे सारे रंग
एक माँ ने सोचे थे बहुत सारे रंग
अपने नन्हे के लिये
पता नही कैसे
सारे रंग , धुंधले होकर
गहरे काले में बदल गए
देखे थे अनगिनत सपने
उसकी आँखे के लिये
पर शून्य में ताकती असकी आँखे
माँ के सपनों को पढ़ नही पाती है
उसका चलना , उसका बोलना ,
उसका हँसना , उसका खेलना
हो जैसे हर बार एक नई चुनौती
पर जब भी वह देखता है
मुस्कराकर
अपनी माँ की ओर,
और लड़खड़ाती आव़ाज से कहता , माँ
उठ खड़ी होती है वह
एक नई चुनौती के लिये हर बार
क्या वापस लौटेंगे
वे सारे रंग ,
घने अन्धकार में जुगनुओं से टिमटिमाते सपने
क्या होंगे उसके आसपास
कड़ी धूप में शीतल छाँव से अपने
क्या माँ बुन पायेगी
अपने नन्हे के लिये एक नया संसार
माँ की सोच में डूबी आँखों को देख
हँस पड़ता है वह इस बार
जैसे , सब कुछ हो समझता
और कहता
माँ , चल उठ
कोशिश करें फिर एक बार
 (मानसिक रूप से निशक्त बच्चो पर बनी फिल्म " स्नेह सम्पदा " के लिये लिखी एक कविता)

94
मौसम


अपने आप से दो कदम और
आगे बढ़कर,
अब खुद की ओर हाथ  बढाने का
मौसम है .
आसपास चारो ओर
हर क्षण में ,
निरंतर सबकुछ खिल रहा है
जीवन  के मुरझाये हुए क्षणों के
सड़ रहे अवशेषों को मिट्टी के हवाले कर
नए फूलो के लिये क्यारियाँ बनाने का मौसम है .
दूसरो को तो कब से आवाज़
लगा रहे हो
उनकी आँखों में अपनी पहचान
तलाश रहे हो
कुछ पल ठहरकर देखो तो
आज खुद से प्रीत लगाने का
मौसम है |
95
सही और गलत


जीवन में क्या सही और क्या गलत है
यह कौन तय करता है
की क्या सही है ?
और क्या गलत है ?
यह किसने तय कर दिया है हमारे लिये
की यह सही और
यह गलत है ?
क्या सही की ओर बढ़ना ही जीवन है
क्या कुछ गलत कर बैठना
जीवन से बड़ा है
क्या इस सही और गलत के बाहर
कोई जीवन नहीं है
क्या इस सही और गलत के परे
जीवन ज्यादा खुबसूरत नहीं होगा
होगा , सचमुच बहुत ही
सुंदर, निश्छल और लहलहाता हुआ
क्योकि हर खुबसूरत और पावन
वस्तु इस सही गलत के परे ही है
जैसे नीला आकाश
रिमझिम, बारिश ,
चिडियों की चहचहाहट
सर्दी की धूप,
गर्मी की शाम ,
धान की खुशबु ,
बौराए आम पर कुहकती
कोयल की आवाज
और एक माँ की आँखों में
उसकी संतान |
96

एक हरा पेड़ - बेटे के लिये  
यह पेड़,
एक बड़ा सा हरा पेड़,
आसमान को छूती डालियों वाला
माँ की हरी चूड़ियों सा हरा पेड़
मैं खेलता हूँ इसकी छाँव में मेरे साथी भी खेलते हैं
तेज हवा में अपनी पत्तियों से नाचता
और डालियों से झूमता यह पेड़ |
दादाजी के पास है चौपाल वाला पेड़
रामलू चरवाहे के पास है गाय भैंसों से घिरा एक हरा पेड़,
माँ, चाची और ताई के पास है -
मौली के धागों से बंधा पूजा पाठ वाला पेड़
दीदी और दादी दोनों को पसंद है -
पके आमो से लदा आँगन का पेड़
पिंटू के दादाजी जानते है -
ढेर सारी दवाओं के गुणों वाला पेड़
माँ कहती है यह सारे पेड़ हमारे अपने है
हमारे अपनो की तरह -
कड़ी धूप में छाया करते
नन्हे पौधों से बड़ी जड़ो वाले बरगद बनाने तक
हमें जाने क्या क्या देते |
यह पेड़ सुनता आ रहा है
जाने कितनी ही कहानियाँ
मीठी अनगढ़ लोरियाँ और बच्चो की किलकारियाँ
दोस्तों के ठहाके, बुजुर्गो की खाँसती लड़खड़ाती आवाज,
पर वह स्वयं है सदियों से मौन
अंकुर फूटने से लेकर अपने हर रूप में
जाने हमें वह क्या क्या दे जाता है
जीवन भर साथ निभाते साथी की तरह साथ रहकर
हमारी अंतिम यात्रा में भी हमसे पहले धू धू कर जल जाता है
क्या ऐसे साथी, ऐसे अभिन्न मित्र को
हमेशा अपने आसपास देखना नहीं चाहेंगे हम !
जो आज अंकुरित होगा तो कल उसकी छाँव तले
खिलखिलायेगा हमारा आनेवाला कल
अगर हमारी पृथ्वी पर होंगे पेड़
अनगिनत बड़े हरे पेड़ |

97
विचारों के लिए एक ज़मीन चाहिए ..
जो वहाँ तक बिछी हो ! जहाँ से आसमा शुरू होता हो
विचारों पर दौड़ते हुए,  अगली छलांग आकाश पर हो सकती है !!

एक जीवित व्यक्ति की आकाश पे छलांग -
उसकी मृत्यु भी हो सकती है !
जीवन और मृत्यु के बीच का समय
एक व्यक्ति के जीवन की वह छलांग है -
जहाँ  वह नितांत अकेला है ..

जीवन में जब आसमान सामने हो
तो दोनों बाहें पंख हो जाए !!
जितना भी जिया गया हो -
समय , हौसलों की खुराक हो जाय

सामना नहीं हुआ है अभी -
पर कहीं किसी कोने में छुपा है ! हाँ  डर है
वह अकेली छलांग , पूरी तरह उघाड़ देगी
केवल मन बचा रह जाएगा -
एहतियात से चुनना  ..
जो बो रहे हो अभी -
विचारों के लिए मिली ज़मीन पर
98
विदा
समय हममे से होकर गुज़रता रहता है
हम उसके महीन बदलाव नहीं देख पाते
घटनाएँ हमारे चारो ओर –
मौसमो को बुन रही होती है
और हम उनमे अपनी पसंद के रंग देखना चाहते हैं
हर रिश्ते से जाने क्या – क्या उम्मींदे हैं हमें ?
बस उन चेहरों में हमारे लिये जो लिखा है
वहीँ नहीं पढ़ पातें |
जन्म से लेकर पूरे जीवन में आगे तो बढ़ते हैं लेकिन
पीछे जहां – जहां जीने से चूंके,
वर्तमान में जीने से चुकते हुए अतीत में झांकते है और
अफ़सोस मनाते हुए एक दिन अपने ही जीवन से
विदा हो जाते हैं |

99
थोड़े से बीत जाओ ....इस तरह !!
मुड़कर देखो जब .....तब, जो होने से छूट गया है
वह - कहीं दिखाई ही न दे !!

100.
पीले फूल और अप्रैल
नाम नहीं जानती मैं उन पीले फूलों का
आज सोलहवा अप्रैल है जिनका ,
जेठ की तपती दुपहरी में ....
कैसे खिले रहते है !
जैसे अभी -अभी, नया- नया घटा हो प्रेम !!
सड़क के दोनों किनारों पर
पीले रंग की तितलियाँ- उड़ते उड़ते थककर बैठ गयी हों जैसे ....
फूल मुरझाये हुए नहीं लगते ,
लगता है पीला रंग लेकर उड़ जायेंगे-
पंखुड़ियों में पंख छिपे है और भूरे -पराग में तितलियों का मन !
पाषाण मूर्तियों में कोमलांगी
जाने कितनी सदियों पहले पाषाण हुयी
उस क्षण से ज़रा ही देर पहले ,
किसकी मन- प्राण हुयी ?
वह उसे पत्थर का देख लौट गया होगा .....
या प्रतिमा का अगला आकार वह स्वयं हो गया
वह शिला हुयी यह कहते हुए -
मेरा प्रेम अश्म की भांति अमर ,
और सूख गया उसी क्षण शोणित- प्रेम को अमर हुआ देख ,
न वो कह पाया की प्रेम क्षणिक ही सही , बहते रक्त सा भला
धड़कता हुआ ....
न वो ही कह पायी शैलजा होकर
की हाँ- बैरी, विश्वासघाती ,चाहे जो होना प्रिय
पाषाण बन अमर न होना
देह का संग साथ छूट भी जाए मन- प्राण एक रहे तो जन्मों का साथ संभव है ....
मैं शिला हुयी तुम उपल तो मुड़कर एक दुसरे को देख भी न पायेंगे ,
और देखते ही देखते वह हो गया अचल ....
कुछ पीले फूल गुड़िया चुन रही है
सुन्दर मूर्तियों के आस -पास थे गिरे
एक चित्रकार उन मूर्तियों को देख रहा है
संग्रहालय का प्रांगण सुंदर शैल आकारों से सजा हुआ है
वह कहता है देखो मूर्तियाँ उदास बेजान है
गुड़िया सुन्दर मूर्तियों की उदासी पढ़ रहे चितेरे को देखती है और अपनी डायरी में फूल रख लेती है ....
तुम लिखती हो ?
मुझे सुनाओगी कुछ !!
वे साथ चलने लगते है ..
पाषाण प्रतिमाऐ मुस्काती सी लग रही है !
क्षणिक हो या जन्मों का साथ लिए हुए -
प्रेम घट रहा है ...इतना काफी है |
इतना ही काफ़ी था ...........
101.

 

Book available in Amazon.in

प्रियंका वाघेला, चित्रकार व लेखिका हैं,  पिछले २० वर्षो से अभी तक लिखी उनकी कविताओं का संग्रह  'मैं तुम्हे लिखना चाहूँ अगर' , सन 2016 में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है |

किताब अब अमेजन पर भी उपलब्ध है

https://www.amazon.in/dp/B078ML4T2G

Book available in Amazon.in